म्यांमार में दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच तीन चरणों में आम चुनाव हुए। फरवरी 2021 के सैन्य तख्तापलट के लगभग पांच साल बाद हुए इन चुनावों में सेना के प्रभाव वाले राजनीतिक दल यूएसडीपी ने भारी बहुमत हासिल किया है। हालांकि, गृहयुद्ध की वजह से पैदा हुई सुरक्षा स्थिति के कारण एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में चुनाव नहीं हो सके और इसके साथ ही राजनीतिक दलों के लिए नए पंजीकरण नियमों के कारण प्रमुख विपक्षी दलों सहित कई लोकतंत्र समर्थित दल चुनाव में भाग ही नहीं ले सके। ग़ौरतलब यह भी है कि पिछले चुनावों के मुकाबले इस बार मतदान प्रतिशत 70 से गिरकर लगभग 55 ही रह गया। चुनाव बाद अब संभावना है कि सेना का विधायी व्यवस्था पर नियंत्रण बरकरार रहेगा जिससे देश में लोकतंत्र की वैधानिकता पर सवाल उठते रहेंगे।
म्यांमार में तीन चरणों में हुए आम चुनाव 25 जनवरी 2026 को पूरे हो गए, जिसकी शुरुआत 28 दिसंबर 2025 को पहले चरण के मतदान के साथ हुई थी। देश के सैन्य तख्तापलट के बाद के राजनीतिक उठापटक और आशंकाओं के बीच यह बेहद ही महत्वपूर्ण समय है। म्यांमार की राजनीतिक संरचना और सेना की आगे की भूमिका, क्षेत्रिय स्थिरता और उससे जुड़े भूराजनैतिक पहलुओं के लिए भी यह समय बेहद ख़ास है। फरवरी 2021 के सैन्य तख्तापलट के लगभग पांच साल बाद आयोजित हुए यह चुनाव अभी भी अनसुलझे गृहयुद्ध, देश के कई इलाकों तक सेना की पहुंच न होने और चुनाव की वैधानिकता संबंधी सवालों में उलझे हुए हैं, जबकि आधिकारिक तौर पर इन्हें संवैधानिक शासन की बहाली की दिशा में एक कदम के रूप में माना जा सकता है।
दिसंबर 2025 – जनवरी 2026 चुनावों की संरचना, प्रशासन और भौगोलिक सीमाएं ऐसे तरीकों से निर्धारित की गई थीं जो मौजूदा शासन और प्रतिरोध समूहों के प्रभाव वाले भौगोलिक क्षेत्र में सत्ता संतुलन को उजागर करते हैं । ये चुनाव तीन चरणों में आयोजित किये गए। पहला चरण 28 दिसंबर 2025 को 102 टाउनशिपों (नगरों) में हुआ, दूसरा चरण 11 जनवरी 2026 को 100 टाउनशिपों में और अंतिम चरण 25 जनवरी 2026 को 63 टाउनशिपों में आयोजित किया गया।[i] कुल मिलाकर 330 में से 265 टाउनशिपों में मतदान की योजना बनाई गई थी। बाकी बचे 65 टाउनशिपों में मतदान सुरक्षा कारणों, राज्य प्रशासन की पहुंच न होने और लोगों के विस्थापन के चलते रद्द कर दिया गया था। इसका मतलब यह हुआ कि देश के लगभग पांचवें हिस्से में चुनाव हो ही नहीं पाया और यदि भौगोलिक क्षेत्रफल की दृष्टि से देखा जाए तो यह अनुपात इससे कहीं अधिक था।
2025-26 के आम चुनाव 2008 के संविधान के प्रावधानों के तहत ही आयोजित किये गए , और यह संविधान संसद की 25 प्रतिशत सीटें बिना चुनाव के सेना के लिए आरक्षित करता है। इतना ही नहीं, यह रक्षा, गृह और सीमा मामलों जैसे प्रमुख मंत्रालयों को सीधे सैन्य अधिकारियों के लिए आरक्षित करने का प्रावधान भी करता है।[ii] इन प्रावधानों का एक सीधा मतलब यही है कि कोई नागरिक सरकार अगर चुनाव में जीत दर्ज भी कर ले, तब भी संसद में क़ानून निर्माण और नीतिगत फैसलों में सेना का ‘वीटो’ बना रहता है साथ ही आरक्षित मंत्रालयों पर उस सरकार का नियंत्रण नहीं के बराबर होता है। इस संवैधानिक संरचना के कारण 664 सदस्यीय संसद में केवल 498 सीटें ही ऐसी हैं जिन पर वास्तविक चुनाव होते हैं। इन सीटों में से भी 440 सीटें निचले सदन पिथु-हलुत्ताव की हैं, जिनमें से 265 सीटों पर इस चरणबद्ध चुनाव के तहत मतदान कराया गया।[iii]
यूनियन सॉलिडैरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (यूएसडीपी) ने मतदान के हर चरण में अपना दबदबा बनाए रखा और म्यांमार की दोनों विधायी सभाओं में भारी बहुमत हासिल किया। निचले सदन पिथु-ह्लुत्ताव में पार्टी ने कुल 263 में से 232 सीटें जीत लीं। वहीं ऊपरी सदन अम्योथा-ह्लुत्ताव में अब तक घोषित नतीजों के अनुसार उसने 157 में से 109 सीटों पर जीत दर्ज की।[iv],[v] यह स्पष्ट होता है कि संसद में सेना के लिए 25 प्रतिशत सीटों के आरक्षण के चलते, यूएसडीपी और वर्दीधारी प्रतिनिधियों का संयुक्त प्रभाव न केवल विधायी प्रक्रिया को प्रभावित करेगा बल्कि संसद पर सेना का वर्चस्व भी बनाए रखेगा। इससे यह सुनिश्चित होता है कि कानून बनाने और नीतिगत फैसलों में सेना की भूमिका निर्णायक बनी रहेगी। अब आगे राष्ट्रपति का चुनाव होना है जो एक निर्वाचन मंडल करेगा, जिसमें संसद के दोनों सदनों के सदस्य शामिल होते हैं।
इस बार के चुनाव में आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, मतदाताओं की संख्या 2.4 करोड़ से अधिक थी और ध्यान देने वाली बात यह है कि यह संख्या 2020 के चुनाव वाली मतदाता सूची की तुलना में लगभग 35 प्रतिशत कम थी।[vi] अधिकारियों के अनुसार, मतदाताओं की संख्या में गिरावट का कारण जनसंख्या का विस्थापन, सुरक्षा संबंधी परिस्थितियां और प्रशासनिक सीमाएं रहे हैं। चुनाव में मतदाताओं की भागीदारी को सरकार ने संतोषजनक बताया और कहा कि आम चुनाव में 1.314 करोड़ से अधिक मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया है जिसका मतलब है कि कुल मतदान प्रतिशत लगभग 55 प्रतिशत रहा।[vii] ग़ौरतलब है कि 2015 और 2020 के चुनावों में मतदान का यह आंकड़ा लगभग 70 प्रतिशत के आसपास था।[viii],[ix] ये दोनों चुनाव 2008 का संविधान लागू होने के बाद पहले ऐसे चुनाव थे जब सबसे लोकप्रिय राजनीतिक पार्टी आंग सांग सू ची के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही थी।
2025 में चुनावों की घोषणा के साथ ही इनके समय और परिस्थितियों को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई थीं जिसके केंद्र में क्षेत्रिय और अंतर्राष्ट्रीय दवाब के साथ कई संवैधानिक मुद्दे भी थे जिनका सीधा संबंध देश में फरवरी 2021 में सेना द्वारा तख्तापलट के बाद जारी आपातकालीन शासन से था। इस आपातकाल के समापन की घोषणा जुलाई 2025 में की गई।[x] दरअसल, 2008 के संविधान के अनुसार, आपातकाल हटाए जाने के बाद छह महीने के भीतर चुनाव कराना एक बाध्यता है।[xi] ये चुनाव संविधान में दी गई इसी बाध्यता के दायित्व को पूरा करने के लिए आयोजित किये गए। मौजूदा संवैधानिक ढांचे के तहत चुनाव कराकर, म्यांमार जुंटा ने शासन की औपचारिक राजनीतिक संरचना को पुनर्स्थापित करने की कोशिश की है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि चुनावी परिणाम चाहे जो भी हों 2008 के संविधान ने ऐसे प्रावधान किए हैं कि सरकार के विधायी और कार्यकारी अंगों पर सशस्त्र बलों का निर्णायक प्रभाव बना रहेगा।[xii] यही संवैधानिक निरंतरता न केवल चुनाव की प्रक्रिया को निर्धारित करती है बल्कि उसके परिणामों को लेकर अपेक्षाओं को भी आकार देती है।
2025-2026 आम चुनावों की प्रक्रिया ने म्यांमार में सुरक्षा और प्रशासनिक स्थितियों के सच को स्पष्टतः सामने ला दिया है जिसमें बड़ी भौगोलिक असमानताएं दिखती हैं। सीधे शब्दों में कहें तो कुछ इलाकों में सेना का सीधा वर्चस्व था तो कुछ में उनकी पूरी तरह से अनुपस्थिति। सैन्य तख्तापलट के बाद से देश में प्रतिरोधी राजनीतिक और सशस्त्र समूहों की संख्या काफी बढ़ी है जिनमें नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट (एनयूजी ), विभिन्न जातीय सशस्त्र संगठन (एथनिक आर्म्ड ऑर्गनाइजेशन्स – ईएओ) और स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर सक्रिय अनेक पीपुल्स डिफेंस फोर्स (पीडीएफ) इकाइयां शामिल हैं।[xiii] ये समूह देश के बड़े भूभाग पर या तो प्रभावी नियंत्रण रखते हैं या वहां, विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों और ग्रामीण इलाकों में, सक्रिय रूप से वर्चस्व के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।
यदि बारीकी से इन चुनावों की पूरी योजना को देखें तो यह स्पष्ट है कि पहले दो चरणों के दौरान मतदान 202 टाउनशिपों में केंद्रित था जो बुनियादी रूप से या तो बहुसंख्यक बामर आबादी वाले क्षेत्र हैं या बड़े शहरी केंद्र जहां आबादी का धनत्व और सेना का प्रभाव अधिक हैं।[xiv] इन इलाकों में राजधानी नेपीदॉ, यांगून, मांडले और येयारवाडी क्षेत्रों के महत्वपूर्ण नगर शामिल थे। इसके उलट चिन, मगवे, काचिन, कायाह, कायिन, रखाइन, शान और सगाइंन क्षेत्रों की अनेक टाउनशिपों को या तो पूरी तरह से मतदान प्रक्रिया से बाहर रखा गया, या उन्हें केवल आंशिक रूप से शामिल किया गया।
तालिका 1
| क्षेत्रीय नियंत्रण की कमी को प्रबंधित करने के लिए तीन चरणों वाली चुनाव संरचना
(28 दिसंबर, 11 जनवरी और 25 जनवरी) का उपयोग किया गया |
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| क्षेत्र का प्रकार | भागीदारी की स्थिति | चुनावी वास्तविकता |
| बामर क्षेत्र (यांगून, मांडले, नैपीदॉ) | उच्च (दबावपूर्ण) | यहां मतदान सबसे व्यवस्थित था। जुंटा ने 50% से अधिक
मतदान की रिपोर्ट दी, हालांकि स्वतंत्र निगरानीकर्ताओं ने इसे बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया और डर से प्रेरित बताया। |
| संघर्ष वाले क्षेत्र (सगाइंन, मगवे) | न्यूनतम | हवाई हमलों और प्रतिरोध अभियानों के कारण अधिकांश टाउनशिपों में मतदान असंभव रहा। सेना ने 2025 में कुछ आधारों को विशेष रूप से मतदान केंद्र सुरक्षित करने के लिए वापस लिया था। |
| जातीय राज्य (चिन, कायाह, राखाइन) | काफी हद तक बाहर | इन राज्यों के बड़े हिस्से में मतदान नहीं हुआ। उदाहरण के लिए,
चिन राज्य में 9 में से केवल 2 टाउनशिपों में मतदान हुआ। राखाइन में अराकान सेना के नियंत्रण के कारण अधिकांश क्षेत्रों में मतदान रद्द कर दिया गया। |
| प्रतिरोध गढ़ | रद्द | उन 65 टाउनशिपों (देश का लगभग 20%) में आधिकारिक तौर
पर मतदान रद्द कर दिया गया था जहां सेना ने स्वीकार किया कि उसका कोई प्रशासनिक नियंत्रण नहीं है। |
म्यांमार के अलग-अलग विद्रोही जातीय समूहों और मीडिया स्रोतों के आंकड़ों और अनुमानों के अनुसार, म्यांमार के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा चुनावी प्रक्रिया में शामिल नहीं हो सका, भले ही चुनाव से बाहर रखे गए टाउनशिपों का अनुपात इससे कम रहा हो।[xv] यह अंतर इस तथ्य को बताता है कि जिन क्षेत्रों को चुनाव से बाहर रखा गया वे भौगोलिक रूप से बड़े इलाके हैं लेकिन वहाँ जनसंख्या तुलनात्मक रूप से कम है।[xvi] ऐसे क्षेत्र आमतौर से अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के नज़दीक या पर्वतीय भूभागों में स्थित हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, 2024 में हुई जनगणना की रिपोर्ट ही यह बताती हैं कि आंकड़े जुटाने का काम म्यांमार के कुल 330 टाउनशिपों में से सिर्फ 145 टाउनशिपों में ही पूरा हो सका था।[xvii] इसका मतलब यह हुआ कि देश के करीब 44 प्रतिशत हिस्से को ही कवर किया जा सका।[xviii] साथ ही ‘एशिया पैसिफिक रिफ्यूजी राइट नेटवर्क (एपीआरआरएन)’ के मुताबिक वो 35 लाख लोग भी मतदान की प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बन सके जो आंतरिक रूप से यानी अपने देश में ही विस्थापन का शिकार हैं।[xix]
जुंटा प्रशासन के अलग-अलग प्राधिकरणों ने मतदान में इस कमी का कारण चल रहे गृहयुद्ध से पैदा हुई सुरक्षा समस्याओं को बताया। अधूरी जनगणना ने परोक्ष रूप से यह स्वीकार किया कि सत्ता पर काबिज सैन्य शासन की क्षेत्रीय पकड़ सीमित है। इसके बावजूद, उन टाउनशिपों में भी चुनाव तय कर दिए गए जहाँ जनगणना सफलतापूर्वक पूरी नहीं हो पाई थी। म्यांमार के संघीय चुनाव आयोग ने इन प्रबल और साफ दिख रही परिस्थितियों को औपचारिक रूप देते हुए ऐसे दर्जनों टाउनशिपों, सैकड़ों वार्डों और ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान रद्द कर दिया जिन्हें प्रतिरोधी समूहों के मजबूत गढ़ के रूप में चिह्नित किया गया था।[xx] इन कदमों के जरिए म्यांमार की राजनीतिक प्रक्रिया को भागीदारी और बहिष्कार के अलग-अलग दायरों में विभाजित कर दिया गया। नतीजतन, जो क्षेत्र पहले से ही विभाजन और टूटन की स्थिति में थे वे न केवल मज़बूत हुए बल्कि उन्हें एक तरह की आधिकारिक मान्यता भी मिल गई।
यह भी जानना महत्वपूर्ण है कि तख्तापलट के बाद से चुनावों तक देश में राजनीतिक व्यवस्था, अभिव्यक्ति की आज़ादी, कानूनी व्यवस्था और चुनाव प्रक्रिया में कई बदलाव हुए हैं और इससे भी चुनाव परिणामों और उनकी वैधानिकता पर सवाल उठाए हैं। पिछले लगभग पांच सालों में कई नए क़ानून/नियम लाए गए तथा उन्हें सख्ती से लागू किया गया। इन कदमों में 2024 में लागू अनिवार्य सैन्य सेवा ( द पीपुल्स मिलिटरी सर्विस लॉ),[xxi] सोशल मीडिया का इस्तेमाल ( साइबर सिक्युरिटी लॉ 2025), स्वतंत्र मीडिया से जुड़ी गतिविधियां (इलेक्ट्रॉनिक ट्रान्ज़ैक्शन लॉ अमेंडमेंट्स), मानवाधिकार से जुड़े क़ानून (इलेक्शन प्रोटेक्शन लॉ 2025) प्रमुख रूप से शामिल हैं।
चुनाव के कुछ महीने पहले म्यांमार में “चुनाव संरक्षण कानून 2025” (द लॉ ऑन द प्रोटेक्शन ऑफ मल्टीपार्टी डेमोक्रेटिक जनरल इलेक्शनस् फ्रॉम ऑब्स्ट्रक्शन, डिस्रप्शन एण्ड डिस्ट्रक्शन) को लागू किया गया जिसके पीछे तर्क यह दिया गया कि चुनाव की प्रक्रिया में बाधा पहुंचाने वाले तत्वों को हतोत्साहित करना चाहिए । इसका निशाना बुनियादी रूप से “चुनाव बहिष्कार” की गतिविधियों से जुड़े लोग थे। इसके कड़े प्रावधानों के फलस्वरूप चुनाव की आलोचना करने या दूसरों को मतदान न करने की सलाह देने के आरोप में 404 से अधिक लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई।[xxii],[xxiii]
इन्हीं नए क़ानूनों में से एक रहा राजनीतिक दलों के पंजीकरण से जुड़ा क़ानून (द पॉलिटिकल पार्टी रेजिस्ट्रेशन लॉ 2023) जिसने लोकतांत्रिक तंत्र को बहुत गहराई से प्रभावित किया।[xxiv] यह क़ानून चुनाव लड़ने की मंशा रखने वाली पार्टियों के लिए बहुत सख़्त शर्तें लेकर आया। इन शर्तों में यह जरूरी था कि कोई भी पार्टी 90 दिनों के भीतर कम से कम एक लाख सदस्य बनाए। इसके अलावा पार्टी के पास एक सौ मिलियन क्यात (म्यांमार की मुद्रा) की वित्तीय पूंजी होना ज़रूरी था। पार्टी को म्यांमार के कम से कम आधे टाउनशिपों में अपने कार्यालय स्थापित करने थे और देश भर में तय न्यूनतम संख्या में निर्वाचन क्षेत्रों से उम्मीदवार उतारने की बाध्यता भी रखी गई थी। इन नियमों ने चुनावी राजनीति के ढांचे को बदल कर रख दिया और कई दलों के लिए चुनावी प्रक्रिया में भाग लेना पहले की तुलना में कहीं ज़्यादा मुश्किल हो गया।
इन नए नियमों की वजह से कई राजनीतिक पार्टियों की वैधानिकता ही समाप्त हो गई। इन बदलावों से पहले जहां 92 राजनीतिक पार्टियां पंजीकृत थीं वहीं अब यह संख्या घटकर 52 रह गईं। चुनाव से काफ़ी पहले ही 40 से ज़्यादा पार्टियों का पंजीकरण रद्द हो गया।[xxv] सबसे अहम बात यह रही कि नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी (एनएल ), जिसने 2015 और 2020 के चुनाव में भारी बहुमत से जीत हासिल की थी, उसे भी अयोग्य घोषित कर दिया गया। पार्टी के नेता, जिनमें आंग सान सू ची भी शामिल हैं, फरवरी 2021 के बाद से अब तक हिरासत में ही हैं। इस समय पार्टी देश के भीतर काम नहीं कर पा रही है और निर्वासन में बनी नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट के जरिए अपनी गतिविधियाँ चला रही है।
हालांकि, इस चुनाव में 57 राजनीतिक दलों से जुड़े 4,800 से अधिक उम्मीदवारों ने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए पंजीकरण कराया था,[xxvi] लेकिन पूरे देश में केवल छह ही दल चुनावी मैदान में उतरे।[xxvii] इसका नतीजा यह हुआ कि चुनावी परिदृश्य पर यूएसडीपी का दबदबा रहा। इस दल को आम तौर पर सेना का एक असैनिक मुखौटा माना जाता है जिसमें ज़्यादातर सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी और पूर्व सरकारी अधिकारी शामिल हैं। कुछ छोटे दल, जिनका आधार क्षेत्रीय या जातीय समूहों से जुड़ा था, सीमित इलाकों में चुनाव लड़ते नज़र आए।
नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट, जातीय हथियारबंद समूह, पीपल्स डिफ़ेन्स फ़ोर्सेज़ और लोकतंत्र समर्थक राजनीतिक नेटवर्क जैसी प्रतिरोधी ताक़तों के लिए यह चुनाव ज़मीनी स्तर पर उनकी गतिविधियों पर तुरंत कोई बड़ा असर फिलहाल डालता हुआ नहीं दिखता। ज़्यादातर प्रतिरोधी समूहों ने इस चुनावी प्रक्रिया को ख़ारिज कर दिया और औपचारिक राजनीतिक ढाँचे से बाहर रहकर अपनी गतिविधियां जारी रखीं। हालाँकि, पिछले साल (2025) में कुछ प्रतिरोधी समूहों को झटके लगे हैं जिनमें उनके हाथ से कई इलाक़े या तो निकल गए या चीन के बीच-बचाव के बाद उन्हें पीछे हटना पड़ा। अब भी कुछ समूह ऐसे हैं जिनके पास बड़े इलाक़ों पर नियंत्रण बना हुआ है। चुनाव के बाद का समय प्रतिरोधी ताक़तों के बीच अंतर को और साफ़ कर सकता है। ऐसे में संकेत इस बात के भी हैं कि कुछ जातीय समूह संघर्ष विराम को प्राथमिकता दे सकते हैं और ऐसी बातचीत की ओर बढ़ सकते हैं जिससे उनकी स्वायत्तता और संसाधन सुरक्षित रह सकें। वहीं दूसरी ओर, खासकर वे पीडीएफ समूह जो तख़्तापलट विरोधी आंदोलनों से निकले हैं वो अपना प्रतिरोध जारी रखेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक साझा और एकजुट विपक्षी रणनीति की कमी से राजनीतिक और हथियारबंद विरोध की कोशिशों में बिखराव को हवा मिल सकती है जो म्यांमार की सेना के वर्चस्व के लिए नई ऊर्जा लेकर आ सकता है।
यह भी कहा जा सकता है कि म्यांमार के गृहयुद्ध में किसी बड़े या निर्णायक बदलाव की संभावना कम है, बल्कि विरोधी ताकतों का प्रतिरोध और कमज़ोर ही होगा। ऐसे में कई चुनौतियां नई सरकार के सामने होंगी जिसमें प्रमुख है गृहयुद्ध की हिंसक तीव्रता को कम करना, 35 लाख से ज़्यादा विस्थापित लोगों को फिर से मुख्य धारा में लाना, बुरी तरह टूट चुके बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण और तेज़ी से गिर रही आर्थिक गतिविधियों में नई ऊर्जा भरना। सवाल यह भी उठता है कि क्या चुनाव के बाद अब फरवरी 2021 से चला आ रहा सत्ता का ढांचा एक औपचारिक रूप ले चुका है, या ले रहा है। यह साफ़ है कि जिन इलाकों पर सेना का नियंत्रण है उन्हें संसद में प्रतिनिधित्व मिल रहा है जबकि जिन क्षेत्रों पर प्रतिरोधी ताक़तों का असर है वे औपचारिक राजनीतिक व्यवस्था से बाहर हो रहे हैं। मार्च 2026 में संसद के गठन के बाद इस प्रक्रिया के पूरा होने की उम्मीद है।
[i] Atul Aneja, “Why Myanmar Can Hope for a Bright Future After Landmark Elections”, The Global New Light of Myanmar, 6 January 2026.
[ii] “Myanmar 2008”, Constitute Project.
[iii] Moe Thuzar, “Myanmar Elections: Change the Only Constant”, ISEAS Yusof Ishak Institute, 9 November 2020.
[iv] “List of Elected Pyithu Hluttaw Representatives”, Union Election Commission Announcement 24/2026, Republic of the Union of Myanmar, The Global New Light of Myanmar, 29 January 2026.
[v] “Notification of List of Elected Pyithu Hluttaw Representatives”, Union Election Commission Announcement 25/2026, Republic of the Union of Myanmar, The Global New Light of Myanmar, 30 January 2026.
[vi] “Govt, Public Ensure 2025 Multiparty Democratic General Election Despite Disruptions”, The Global New Light of Myanmar, 27 January 2026.
[vii] “Voter Turnout Reaches About 55 % in Myanmar’s 2025 General Election”, The Nation, 28 January 2026.
[viii] William R. Sweeney, “Myanmar’s Historic 2015 Elections”, International Foundation for Electoral Systems, 24 November 2015.
[ix] “Myanmar Junta Says Voter Turnout at 52% in First Phase of Election”, Channel News Asia, 31 December 2025.
[x] “Confirmed: Multiparty General Election Set for December”, The Global New Light of Myanmar, 31 July 2026.
[xi] “Myanmar 2008”, no. 2.
[xii] “A New Constitution For Myanmar”, International Institute for Democracy and Electoral Assistance, 2022.
[xiii] Sampa Kundu, “Unraveling Myanmar’s Security Landscape: Understanding its Implications and Distinctive Features”, AIC Working Paper No. 13, ASEAN-India Centre, Research and Information System of Developing Countries, July 2024.
[xiv] “Myanmar: A Junta-Staged Election in the Midst of a War”, Data Dive, Issue No. 25, ANFREL News, Myanmar.
[xv] Wai Min Tun, “Junta-Organized Election Will Reach Barely Half of Myanmar”, The Irrawaddy, 23 December 2025.
[xvi] Ibid.
[xvii] “Census Report Volume (I)”, 2024 Population and Housing Census, Department of Population, Ministry of Immigration and Population, The Republic of the Union of Myanmar, December 2024.
[xviii] “145 Townships Covered, 58 Uncounted in 2024 Myanmar Population Census”, The Nation, 3 January 2025.
[xix] “Myanmar Displacement Crisis Deepens Amid Illegitimate Elections”, Jesuit Refugee Service, Asia Pacific, 1 February 2026.
[xx] “Announcement 56/2025”, Union Election Commission, Republic of the Union of Myanmar, 20 August 2025.
[xxi] “Promulgated the People’s Military Service Rules and Regulations by Notification No 2/2025”, Ministry of Information, Republic of the Union of Myanmar, 23 January 2025.
[xxii] “Myanmar Arrests Hundreds Under New Election Law Ahead of December Vote”, Reuters, 19 December 2025.
[xxiii] “324 Offenders Face Legal Action for Sabotaging Elections”, The Global New Light of Myanmar, 21 January 2026.
[xxiv] “Political Parties Registration Law”, State Administration Council Law No 15/2023, State Administration Council, Republic of the Union of Myanmar, 26 January 2023.
[xxv] “A Road to Nowhere: The Myanmar Regime’s Stage-managed Elections”, International Crisis Group, 28 March 2023.
[xxvi] Tian Macleod Ji and Grant Peck, “Myanmar Holds First Election Since Military Seized Power But Critics Say the Vote is a Sham”, Associated Press, 28 December 2025.
[xxvii] “Govt, Public Ensure 2025 Multiparty Democratic General Election Despite Disruptions”, The Global New Light of Myanmar, 27 January 2026.
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