पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान संबंधों का इतिहास कई उतार-चढ़ावों एवं चुनौतियों से भरा रहा है. फरवरी 2026 में पाकिस्तानी सेना द्वारा चलाए गए “ऑपरेशन ग़ज़ब-लिल –हक़” के जवाब में अफ़ग़ानिस्तान ने “ऑपरेशन रद्द-अल-ज़ुल्म” का आगाज़ किया जिसके फलस्वरूप द्विपक्षीय संबंध गर्त में समाने लगे हैं. पाकिस्तान अपने सैन्य ऑपरेशन को न्यायोचित ठहराने के लिए तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टी.टी.पी.), जिसे वह “फितना-अल-ख्वारिज़” के नाम से संबोधित करता है, की अफ़ग़ानिस्तान के सीमान्त इलाकों में उपस्थिति तथा वहाँ मिलने वाले प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष समर्थन को रेखांकित करता है. पाकिस्तानी ऑपरेशन के पीछे का वास्तविक कारण तालिबान प्रशासन का उनकी उँगलियों पर नाचने से इंकार करना प्रतीत होता है.
पाकिस्तान–अफ़ग़ानिस्तान द्विपक्षीय संबंधों का इतिहास काफी उतार चढाव वाला रहा है. वर्ष 1947 में जब पाकिस्तान अपने स्वतंत्र अस्तित्व की पुष्टि के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता का आकांक्षी था तो अफ़ग़ानिस्तान एक मात्र ऐसा देश था जिसने इसका प्रत्यक्ष रूप से विरोध किया था. सोवियत संघ द्वारा 1979 में किए गए हस्तक्षेप के दौरान बदली हुई परिस्थिति में पाकिस्तान “अफ़ग़ान जिहाद” का इन्चार्च बन गया. लगभग एक दशक तक चले इस “पवित्र युद्ध” में अमेरिका, सऊदी अरब व अन्य देशों से प्राप्त आर्थिक और सैन्य मदद को पाकिस्तान ने विभिन्न संगठनों में न केवल बाँटा बल्कि उन्हें अपनी जमीन पर जरुरी प्रशिक्षण भी दिया. इन सबका सम्मिलित परिणाम यह हुआ कि सोवियत संघ जैसी महाशक्ति को इस क्षेत्र से खाली हाथ वापस जाना पड़ा. सोवियत संघ के 1989 में अफ़ग़ानिस्तान से हट जाने से खाली हुआ पॉवर वैक्यूम को भरने और काबुल की सत्ता पर काबिज़ होने के लिए एक बड़ा गृहयुद्ध छिड़ गया. पाकिस्तान के सभी संगठनों से रिश्ते थे लेकिन इस गृहयुद्ध में जो समर्थन मुल्ला उमर के तालिबान को मिला वैसा किसी अन्य संगठन को प्राप्त नहीं हुआ इसी कारण से जल्द ही अफ़ग़ान तालिबान ने काबुल की सत्ता हथिया ली.
इस रिश्ते की कठिन परीक्षा उस समय हुई जब 2001 में अमेरिका ने 9/11 हमलों के तार अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान से जोड़े और अमेरिकी उप रक्षा सचिव रिचर्ड आर्मिटेज ने पाकिस्तान को पाषाणकाल में पहुँचाने की धमकी दी. जनरल मुशर्रफ के नेतृत्व में पाकिस्तान ने अमेरिकी “आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक युद्ध” में भाग लेने की सहमति तो दी, लेकिन तालिबान से अपने रिश्ते समाप्त नहीं किए और उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से और चोरी-छिपे समर्थन करता रहा. यह एक ऐसा समय था जब पाकिस्तान और तालिबान दोनों को एक दुसरे की आवश्यकता था. तालिबान को स्वयं को बचाए रखने और अमेरिकी फौजों से लड़ने के लिए पाकिस्तानी मदद कि ज़रुरत थी तो वहीँ पाकिस्तान को अफगानिस्तान में “स्ट्रेटेजिक डेप्थ” बनाए रखने तथा पूरे क्षेत्र में घृणित कार्यकर्म को जारी रखने के लिए तालिबान की मदद की ज़रूरत थी.
अगस्त 2001 में अमेरिकी फौजों के अफ़ग़ानिस्तान से निकल जाने पर तालिबान को पाकिस्तान की अब उतनी ज़रूरत नहीं रही जैसी कि पहले थी. लेकिन पाकिस्तान को अब भी तालिबान की आवश्यकता थी. अमेरिकी फौजों के जाने के तुरंत बाद पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेन्सियां न केवल पूरी तरह सक्रिय हो गईं बल्कि अपनी भविष्य की रणनीतियों पर काम करना भी प्रारंभ कर दिया. पाकिस्तान ने इस मौके पे जश्न भी मनाया लेकिन यह जश्न ज्यादा समय तक चल नहीं सका. तालिबान अपने नए अवतार में पहले से अधिक अनुभवी और यथार्थवादी हो गए थे. अब उन्हें इस बदली हुई दुनिया के कुछ कूटनीतिक और रणनीतिक दाँव-पेंचों का भी ज्ञान हो चुका था और वह यह बात भी जान चुके थे कि उनकी पुरानी नीतियाँ उन्हें वैश्विक मंच पर अलग-थलग कर देंगी. इसलिए उन्होंने यह तय किया कि वह अपनी जमीन का उपयोग किसी भी देश को किसी अन्य देश के खिलाफ साजिश रचने में नहीं करने देंगे.
काबुल की सत्ता पर काबिज़ होने के बाद अपनी पहले ही संवाददाता सम्मलेन में 17 अगस्त 2021 को तालिबान प्रवक्ता ज़बिउल्ला मुजाहिद ने स्पष्टतः कहा कि तालिबान अन्य देशों के साथ शांतिप्रिय सम्बन्ध की कामना करते हैं और किसी भी संगठन को अफ़ग़ानिस्तान की जमीन का उपयोग किसी देश पर हमले के लिए नहीं करने दिया जाएगा.[1] उनके इस कदम का सभी ने खुले मन से स्वागत किया. लेकिन पाकिस्तान में इसको लेकर मातम जैसी स्थिति हो गयी. पाकिस्तान ने इसे अपनी भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं एवं क्षेत्रीय उद्देश्यों की राह में एक बड़े रोड़े की तरह देखा. इन सबके अतिरिक्त जल्द ही तालिबान ने स्पष्ट कर दिया कि वह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टी.टी.पी.) की अफ़ग़ानिस्तान में उपस्थिति के मामले में पाकिस्तान की चिंताओं का उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप कोई समाधान नहीं करेगा. इसलिए जल्द ही दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में तनाव उत्पन्न हुआ जो आगे चलकर एक संघर्ष के रूप में सामने आ गया.
पाकिस्तान अब खुले रूप से तालिबान पर आरोप लगाने लगा कि वह टी.टी.पी., जिसे पाकिस्तान “फितना-अल-ख्वारिज़” कहकर संबोधित करता है, को न केवल अफ़ग़ानिस्तान में पनाह देता है बल्कि उसे जरुरी मदद भी पहुँचाता है. ऐसा माना जाता है की पाकिस्तानी सीमा से सटे कम से कम चार अफ़ग़ान प्रान्तों—कुनार, निंगरहार, खोस्त, और पक्तिका—में टी.टी.पी. सक्रिय है और वहाँ से पाकिस्तान के खैबर पख्तुन्ख्वा प्रान्त व अन्य जगहों पर हमले करता है. वर्ष 2024 में सीनेट की एक कमेटी को दी गयी एक रिपोर्ट में पाकिस्तानी विदेश मंत्री एवं उप प्रधानमंत्री इशाक डार ने इंगित किया था कि टी.टी.पी. पाकिस्तान को अस्थिर करना चाहता है तथा इसके चीन से संबंधों को अस्त-व्यस्त करना चाहता है. पाकिस्तान ने टी.टी.पी. के मुद्दे को लेकर अफ़ग़ानिस्तान पर लगातार दबाव बनाने का प्रयास किया लेकिन तालिबान ने हमेशा ही अपने आधिकारिक वक्तव्यों में इसे पाकिस्तान का आंतरिक मामला बताया. साथ ही उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पाकिस्तान इस्लामिक स्टेट ऑफ़ खोरासन प्रोविंस (आई.एस.के.पी.) को अपने यहाँ पनाह देता है जो अक्सर अफ़ग़ानिस्तान पर हमले करते हैं. हालाँकि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स इस तरफ भी इशारा करती हैं कि तालिबान ने पाकिस्तान और टी.टी.पी. के बीच बात-चीत भी कराई थी जो दोनों पक्षों के कड़ा रुख अपनाने के कारण किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सकी.
यह एक स्थापित तथ्य है कि टी.टी.पी. को अपने वर्तमान स्वरुप में आने से पहले पाकिस्तानी सेना और ख़ुफ़िया संस्थाओं की पहली पसंद थी जिसने अफ़ग़ान तालिबान के साथ मिलकर अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी फौजों की उपस्थिति के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा था. लेकिन बाद में जब अमेरिकी दबाव में पाकिस्तान ने पाकिस्तान-अफगानिस्तान की सीमा से सटे कबीलाई इलाकों में सैन्य ऑपरेशन चलाए तो यह पाकिस्तानी सेना के विरुद्ध हो गया. जब तक अमेरिकी फौजें अफ़ग़ानिस्तान में उपस्थित थीं तो टी.टी.पी. जैसे संगठन अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे थे. अगस्त 2021 से उनकी अनुपस्थिति के कारण पाकिस्तान के लिए खतरा लगातार बढ़ता चला गया. अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी ने आग में घी डालने का काम किया क्योंकि अब टी.टी.पी. को अफ़ग़ान तालिबान का समर्थन हासिल हो गया था. यही कारण है कि अगस्त 2021 से लगातार पाकिस्तान में टी.टी.पी. के द्वारा किए जा रहे हमलों की तीव्रता और संख्या दोनों में काफी इजाफा हुआ है.
पाकिस्तान में वर्ष 2025 काफी तबाही लाने वाला साल रहा है. आर्म्ड कनफ्लिक्ट लोकेशन, एण्ड इवेंट डाटा प्रोजेक्ट (ए.सी.एल.ई.डी.) के अनुसार टी.टी.पी. ने 2025 में एक हज़ार से भी अधिक हमले किए. वर्ष 2026 भी उस दृष्टिकोण से कम हिंसक नहीं रहा है. इस सम्बन्ध में टी.टी.पी. का अपना डाटा, जो उनके टेलीग्राम चैनल उमरमीडिया पर उपलब्ध है, आँख खोलने वाला रहा है. उनके अनुसार वर्ष 2025 में टी.टी.पी. ने पाकिस्तान में 3573 हमलों को अंजाम दिया जिसमें 3481 “दुश्मनों” की मौत हुई और 3818 लोग घायल हुए. वर्ष 2026 में अब तक 333 हमलों को अंजाम दे चुका है.
पाकिस्तान द्वारा अफ़ग़ानिस्तान पर दबाव बनाने की किसी भी कूटनीतिक एवं रणनीतिक उपायों का कोई सकारात्मक परिणाम न प्राप्त होने की अवस्था में उन्होंने कई दशकों से वहाँ रह रहे अफ़ग़ान शरणार्थियों को जबरन अफ़ग़ानिस्तान वापस भेजना शुरू किया. वर्ष 2023 में प्रारंभ हुई इस प्रक्रिया के अंतर्गत अब तक पाकिस्तान में रह रह कई मिलियन अफ़ग़ान नागरिकों वापस भेजा जा चुका है. ह्यूमन राइट्स वाच के अनुसार वर्ष 2026 में ही 1,46,000 से अधिक अफ़ग़ान नागरिकों जबरन वापस भेजा जा चुका है.[2] जब इससे भी टी.टी.पी. के मामले में अपेक्षित सफलता नहीं मिली तो पाकिस्तान में सैन्य और राजनीतिक सत्ता के शीर्ष पर विद्यमान लोगों ने अफ़ग़ानिस्तान पर सैन्य कार्यवाही करने का फैसला लिया. इस क्रम में 9 अक्टूबर 2025 को पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाज़ा आसिफ ने अपने एक वक्तव्य में कहा कि कई वर्षों की बात-चीत के बाद भी यह खून-खराबा नहीं रुक सका है. उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान पिछले छः दशकों से लाखों अफ़ग़ान लोगों को शरण देने का फल भुगत रहा है.[3] इसके बाद उसी दिन पाकिस्तानी सेना ने अफ़ग़ानिस्तान के भीतर “टी.टी.पी. पनाहगाहों” को निशाना बनाया.
यह हमला एक ऐसे समय में हुआ जब अफ़ग़ानिस्तान के कार्यकारी सरकार के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी अपने पहले भारत दौरे पर थे. ऐसा प्रतीत होता है कि पाकिस्तान मुत्तकी की इस भारत यात्रा से पूरी तरह बौखला गया और इस बौखलाहट में उसने अफ़ग़ानिस्तान के भीतर हवाई हमले शुरू कर दिए. इन हमलों के माध्यम से पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान को यह बताना चाह रहा था कि उसकी भारत के साथ नजदीकियों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं. अफ़ग़ानिस्तान ने भी इस हमले के खिलाफ जवाबी कार्यवाही करते हुए सीमा पर भारी गोलाबारी शुरू कर दी. मामले की गंभीरता को देखते हुए तुर्किए और क़तर ने हस्तक्षेप किए और उनके प्रयासों से 19 अक्टूबर 2025 को दोनों देशों के बीच युद्धविराम तो हुआ[4] लेकिन दोनों पक्ष किसी दीर्घकालिक समझौते पर नहीं पहुँच सके.
अक्टूबर 2025 में तुर्किए और क़तर की पहल पर हुआ युद्धविराम लंबे समय तक दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने में विफल रहा क्योंकि दोनों पक्ष एक सीमित रूप से एक-दूसरे के विरुद्ध सीमा पर कार्यवाहियां करते रहे. फरवरी 2026 में परिस्थितियां काफी गंभीर हो गईं जब पाकिस्तान ने एक बार फिर से अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया. इस बार पाकिस्तान की सेनाओं ने नभ और थल से सम्यक रूप से एक बड़ा हमला करते हुए अफ़ग़ानिस्तान के काबुल, कंधार, पक्तिका, निंगरहार समेत अन्य कई स्थानों पर नुकसान पहुँचाया. इस हमले का प्रारंभ 21-22 फरवरी की मध्य रात्रि में हुआ. पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार इस हमले में निंगरहार प्रान्त में सात आतंकी पनाहगाहों को निशाना बनाया गया जिसमें तालिबान कमांडर अख्तर मोहम्मद समेत कई अन्य लड़ाकों की मौत हो गयी.[5] पाकिस्तान के उप-गृहमंत्री तलाल चौधरी ने जियो न्यूज़ को दिए साक्षात्कार में यह दावा किया कि इन हमलों में कम से कम 70 विद्रोहियों कि मृत्यु हो गयी. बात में अन्य मीडिया संस्थान ने अपनी रिपोर्ट में यह संख्या 80 बताई.[6] अफ़ग़ानिस्तान ने पाकिस्तान पर निर्दोष व आम लोगों पर हमले करने का आरोप लगाया जिसकी पुष्टि संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी यह कहते हुए की कि पाकिस्तान के हमले में आम जान माल की क्षति हुई.[7]
इस हमले के जवाब में अगले ही दिन टी.टी.पी. ने खैबर पख्तुन्ख्वा प्रान्त के बहादर खेल क्षेत्र में स्थित फ्रंटियर कोर के एक किले पर ड्रोन से हमला कर दिया और जब इस हमले में घायल जवानों को एम्बुलेंस में अस्पताल ले जाया जा रहा था तो उस एम्बुलेंस को भी निशाना बनाया गया. पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार घायलों सहित एम्बुलेंस को आग के हवाले कर दिया गया जिससे कुल तीन फ्रंटियर कोर के जवानों की मौत हो गयी जबकि पाँच अन्य घायल हो गए.[8] अगले कुछ दिनों तक दोनों पक्षों के बीच सीमा पर जबरदस्त गोलीबारी हुई जिसके दौरान दोनों पक्षों ने एक-दूसरे की चौकियों पर कब्ज़ा कर लेने का दावा किया. अब्दुल हामिद खोरासानी, पंजशेर का एक ताज़िक कमांडर जो 2021 के बाद तालिबान का हिस्सा हो गया, ने तोलो न्यूज़ को 24 फरवरी को दिए गए साक्षात्कार में यह दावा किया कि उनके आत्मघाती हमलावरों की पूरी फौज पाकिस्तान में बैठी आदेशों का इंतजार कर रही है और वह उन्हें कभी भी सक्रिय करके अफरा-तफरी फैला सकते हैं.[9] उसने तो यहाँ तक दावा किया कि यदि तालिबान के अमीर आदेश दें तो पूरे पाकिस्तान पर कब्ज़ा किया जा सकता है.[10]
इसी क्रम में 25 फरवरी को अल अरबिया न्यूज़ को दिए साक्षात्कार में तालिबान प्रवक्ता ज़बिउल्ला मुजाहिद ने पाकिस्तान के ऊपर पलटवार करने का दावा किया. उन्होंने यह भी दावा किया कि पाकिस्तानी हमले में निंगरहार प्रान्त की एक 22-सदस्यीय परिवार के 17 लोगों की मौत हो गयी जबकि पाँच लोग घायल हो गए. इसी तरह के एक हमले में पक्तिका प्रान्त में एक विद्यालय को निशाना बनाया गया था जिसमें एक बच्ची की मौत हो गयी थी तथा कुछ भवनों को क्षति पहुँची थी. इसकी जवाब कार्यवाही में अफ़ग़ान तालिबान ने सीमा-पार पाकिस्तानी चौकियों पर भरी गोलीबारी की. पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने बाद में दावा किया कि अफ़ग़ानिस्तान ने खैबर पख्तुन्ख्वा प्रान्त के 15 सेक्टर्स की 53 लोकेशंस पर उकसाने वाली कार्रवाइयां की जिसके फलस्वरूप पाकिस्तानी सेना ने ऑपरेशन ग़ज़ब-लिल-हक़ का आगाज़ किया.[11]
ग़ज़ब-लिल-हक़ का शाब्दिक मतलब न्याय के लिए आक्रोश है. पाकिस्तानी सेना के इस अद्वितीय ऑपरेशन के तहत काबुल, कंधार, पक्तिका, और निंगरहार प्रान्तों पर पाकितानी फाइटर जेट्स ने लगातार हवाई हमले किए. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह हमले पाकिस्तानी नागरिकों की सुरक्षा के लिए तथा आतंकवादी हमलों को रोकने के लिए किए गए थे.[12] पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इसके साथ ही अफ़ग़ानिस्तान के विरुद्ध खुले युद्ध की घोषणा कर दी.[13] अफ़ग़ानिस्तान ने इन हवाई हमलों को रोकने के लिए एंटी-एयरक्राफ्ट गन एवं मैन पोर्टेबल एयर डिफेन्स सिस्टम (मैनपैड) जैसे हथियारों का प्रयोग किया लेकिन यह पाकिस्तानी फाइटर जेट्स को रोकने या उन्हें हतोत्साहित करने में विफल रहे. अफ़ग़ानिस्तान ने अपने जवाबी ऑपरेशन को रद्द-अल-ज़ुल्म का नाम दिया जिसका तात्पर्य है ज़ुल्म के खिलाफ की गयी कार्रवाई. ज़बिउल्ला मुजाहिद ने सोशल मीडिया एक्स पर यह दावा किया कि अफ़ग़ानिस्तान ने पाकिस्तान की सेना के खिलाफ डूरंड लाइन के उस पार बड़े स्तर पर आक्रमण का आगाज़ किया है.[14] एक अफ़ग़ान सूत्र के हवाले से अल ज़जीरा ने भी यह दावा किया कि अफ़ग़ान कार्रवाई में 10 पाकिस्तानी सैनिकों की मौत हो गयी और 13 पाकिस्तानी चौकियों पर अफ़ग़ानिस्तान का कब्ज़ा हो गया.[15] पाकिस्तान ने इस दावे को न केवल ख़ारिज कर दिया बल्कि एक नया दावा किया कि उसकी सेना ने पाँच अफगान चौकियों पर कब्ज़ा कर लिया है और वहाँ पाकितानी परचम लहरा दिया है.[16]
अमेरिकी फौजियों के 2021 में अफ़ग़ानिस्तान छोड़ देने के बाद पहली पर बगराम एयर बेस तब हमले की जद में आ गया जब पाकिस्तानी सेना ने एक हवाई हमले में रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण इस सैन्य ठिकाने को निशाना बनाया. कुछ मीडिया रिपोर्ट और सैटेलाईट इमेज से यह प्रतीत होता है कि इस हमले में एक हैंगर और दो वेयरहाउस तबाह हो गए.[17] हालाँकि तालिबान ने ऐसी किसी भी रिपोर्ट्स को भ्रामक बताया और यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि एयरबेस पर हुए हमले को नाकाम कर दिया गया था. दोनों पक्षों के द्वारा जारी संघर्ष के बीच अगले कुछ दिनों तक दावों का सिलसिला लगातार चलता रहा| इसके बाद 16 मार्च 2026 को पाकिस्तान ने काबुल स्थित ओमिद ड्रग एडिक्शन ट्रीटमेंट हॉस्पिटल पर एक बड़ा हमला किए जिसमें तालिबान के अनुसार कम से कम 408 लोगों की मौत हो गयी.[18] इस हमले में कम से कम तीन भवनों, जिनमे एक डायनिंग एरिया और गार्ड रूम शामिल थे, को उस समय निशाना बनाया गया जब वहाँ 1,000 से अधिक लोग उपस्थित थे. न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक संयक्त राष्ट्र संघ के अधिकारी के हवाले से यह दावा किया कि इस हमले में कम से कम 143 लोगों की मौत हो गयी थी और 119 लोग घायल हुए थे.[19] पाकिस्तान द्वारा किए गए इस हमले को ह्यूमन राइट्स वाच ने गैरकानूनी और युद्ध-अपराध की श्रेणी में रखा.[20] मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी पाँच बिन्दुओं वाला वक्तव्य जारी करते हुए अस्पताल पर पाकिस्तानी हमले की निंदा की और अफ़ग़ान संप्रभुता और एकता अखंडता के प्रति अपना समर्थन दोहराया.[21] भारत ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से बिना देरी किए पाकिस्तान को इस आपराधिक कृत्य और निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाने के लिए उत्तरदायी ठहराने के लिए कहा.[22]
अगले दो दिनों के भीतर ही पाकिस्तानी सूचना मंत्री अताउल्ला तरार ने ईद के त्यौहार को ध्यान में रखते हुए अगले पाँच दिनों के लिए युद्ध विराम की घोषणा की. इसके बाद ज़बिउल्ला मुजाहिद ने भी उक्त अवधि में अफ़ग़ान सेना के ऑपरेशन को रोकने की पुष्टि की. इस बार युद्ध विराम की यह घोषणा सऊदी अरब, तुर्कीए, और क़तर के अनुरोध पर की गयी.[23] इसके तुरंत बाद अफ़ग़ानिस्तान के गृहमंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी ने स्पष्ट किया कि अफ़ग़ानिस्तान बदले की भावना में नहीं है और उसके दरवाजे बात-चीत के लिए खुले हैं.[24] यह पहला संकेत था कि अब दोनों पक्ष युद्ध विराम को स्थाई रूप देने का प्रयास कर सकते हैं. हालाँकि पाकिस्तानी मीडिया के एक तबके ने इस वक्तव्य को अफ़ग़ानिस्तान की सैन्य कमजोरी से जोड़कर देखने का प्रयास किया.
पाँच दिन के युद्ध विराम के समाप्त होने के बाद दोनों देशों की ओर से छिटपुट संघर्ष की ख़बरें फिर से आने लगीं. इस बीच पाकिस्तान ने स्पष्ट किया कि वह तब तक अपना सैन्य ऑपरेशन जारी रखेगा जब तक उसके उद्देश्यों की पूर्ति नहीं हो जाती और तालिबान प्रशासन आतंक के आधारभूत ढांचों को अपना समर्थन देता रहता है.[25] चूँकि विश्व समुदाय का ध्यान इस समय अमेरिका-इजरायल और इरान की बीच जारी युद्ध पर था इसलिए पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान के बीच के संघर्ष को रोकने के लिए कम प्रयास हो सके. इस बीच चीन ने इस मामले में पहल करते हुए दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच उरुमकी में 1 से 7 अप्रैल के मध्य शांति वार्ता कराई. कई दौर की इस बात-चीत के लिए अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और ख़ुफ़िया एजेन्सिओं के अधिकारियों का एक शिष्टमंडल नियत समय पर जिनजियांग उइगुर ऑटोनोमस रीजन की राजधानी उरुमुकी पहुंचा. बात-चीत की मेज पर पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के साथ-साथ कुछ चीनी अधिकारी भी मौजूद थे.
चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने 3 अप्रैल को जानकारी दी कि पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान चीनी मध्यस्थता को महत्त्व देते हैं और उसका स्वागत करते हैं. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया की तीनों पक्षों के बीच आम सहमति बन चुकी है और तीनों पक्षों ने मामले को सुलझाने के लिए एक विस्तृत मसौदे पर बात-चीत की है और पाकिस्तान तथा अफ़ग़ानिस्तान ने मुख्य मुद्दे को चिन्हित कर लिया है.[26] यद्यपि दोनों पक्ष किसी औपचारिक समझौते पर नहीं पहुँच सके हैं लेकिन संघर्ष को रोकने के लिए दोनों के बीच एक अनौपचारिक सहमति बनी है. अमीर खान मुत्तकी ने 7 अप्रैल को अफ़ग़ानिस्तान में चीन के राजदूत से मुलाक़ात की और पाकिस्तान के साथ बात-चीत की व्यवस्था करने के लिए उनका धन्यवाद किया. बाद में उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पाकिस्तान के साथ बात-चीत उपयोगी रही है. अफगान विदेश मंत्रालय के उप प्रवक्ता जिया अहमद तकाल ने और अधिक जानकारी देते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच रचनात्मक बात-चीत हुई है और छोटे-मोटे स्पष्टीकरण समझौते की प्रक्रिया में बाधा नहीं होंगे.[27] इन वक्तव्यों के बाद भी पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर छिट-पुट संघर्ष की ख़बरें ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही हैं. तालिबान अधिकारयों ने हाल ही में फिर से आरोप लगाया कि पाकिस्तान द्वारा 26 अप्रैल को पूर्वी कुनार प्रान्त पर हमला किया जिसमें चार लोगों कि मौत हो गयी.[28] पाकिस्तान ने भी यह दावा किया कि दक्षिण वजीरिस्तान में अफ़ग़ान गोलीबारी के कारण तीन लोगों की जन चली गयी.[29]
पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान द्विपक्षीय रिश्ते ऐतिहासिक रूप से उतार-चढ़ाव से भरे रहे हैं लेकिन पाकिस्तान द्वारा अफ़ग़ानिस्तान के खिलाफ खुले युद्ध की घोषणा ने इसे गर्त में पहुँचा दिया है. सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह कि पाकिस्तान इस तरह के हमले से किन उद्देश्य्यों को हासिल करना चाहता था तथा क्या वह इन उद्देश्यों को उरुमकी में हुई बात-चीत के बाद प्राप्त कर सका है? यदि हम आधिकारिक वक्तव्यों पर नज़र डालें तो पाते हैं कि पाकिस्तान का मुख्य उद्देश्य टी.टी.पी. को नेस्तनाबूद करना है ताकि वह उसकी आतंरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा न बन सके. लेकिन व्यावहारिक धरातल पर देखने से ज्ञात होता है कि टी.टी.पी. को काबू में करने से भी बढ़कर, पाकिस्तान तालिबान प्रशासन को अपनी उँगलियों पर नचाना चाहता है. अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता पर काबिज़ तालिबान प्रशासन इन दोनों विषयों में पाकिस्तान को कोई छूट नहीं देना चाहता है. तालिबान अपने मित्रों और शरणार्थियों की हर कीमत पर सुरक्षा करने के लिए जाने जाते हैं.
यह एक स्थापित तथ्य है कि 9/11 के हमले के बाद अमेरिकी धमकियों के बावजूद उन्होने अल-क़ायदा और उसके प्रमुख नेताओं को सौंपने से इंकार कर दिया था जिसके परिणामस्वरूप अमेरिकी प्रशासन ने “आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक युद्ध” की घोषणा की थी और इसका केंद्र अफ़ग़ानिस्तान था. जहाँ तक वर्तमान समय में टी.टी.पी. का प्रश्न है, वह उनके लिए एक मित्र और शरणार्थी से कहीं आधिक है. वह एक तरह से उनका वैचारिक जुड़वाँ भाई है जिसे तालिबान किसी भी कीमत पर अपने से अलग नहीं करेंगे. अफ़ग़ान तालिबान अब किसी दूसरे देश की कठपुतली बनाकर सत्ता में नहीं रहना चाहते हैं. दशकों के सैन्य संघर्ष और कूटनीतिक एवं राजनीतिक अनुभवों ने उन्हें काफी हद तक परिपक्व बना दिया है और यही कारण है कि वह वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में अलग-थलग रहने के बजाए सभी देशों के साथ शांतिप्रिय सम्बन्ध स्थापित कर आगे बढ़ना चाहते हैं.
पाकिस्तान एक स्वतंत्र सोच वाले तालिबान को स्वीकार नहीं करना चाहता और यही इस समस्या की जड़ है. पाकिस्तान के सैन्य एवं राजनीतिक सत्तासीन लोगों को लगता है कि शायद तालिबान के खिलाफ बल प्रयोग उन्हें विवश कर देगा. वास्तविकता इसके बिलकुल विपरीत है. वाह्य बल प्रयोग तालिबान को विवश करने के बजाय उन्हें और अधिक मज़बूत करेगा. अफ़ग़ानिस्तान पाकिस्तान की तुलना में एक बहुत कमज़ोर सैन्य शक्ति है लेकिन इसका यह आशय कत्तई नहीं है कि वह उसके सामने नतमस्तक हो जाएगा. तालिबान की असली ताकत गुरिल्ला युद्ध में उनकी निपुणता और वाह्य खतरों के समक्ष डटकर खड़े होना है. पाकिस्तान के द्वारा बार-बार उकसाने के नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं. अभी तक अफगान तालिबान, टी.टी.पी. के साथ पाकिस्तान के खिलाफ किए जा रहे हमलों में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं है. लेकिन यदि पाकिस्तान अपनी कारगुजारियों से बाज न आया तो वह दिन दूर नहीं जब दोनों वैचारिक जुड़वाँ संगठन पाकिस्तान के विरुद्ध सम्मिलित कार्रवाइयों को अंजाम देना शुरू कर देंगे जिससे पूरे क्षेत्र में शांति एवं स्थायित्व का एक बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा.
[1] Zaheena Rasheed and Arwa Ibrahim et al., “Taliban Offers Amnesty, Promises Women’s Rights and Media Freedom”, Al Jazeera, 17 August 2021.
[2] “Pakistan: Surge in Forced Returns of Afghan Refugees”, Human Rights Watch, 21 April 2026.
[3] “Asif Slates Afghan Refugees for ‘Sheltering’ Terrorists, Urges Them to Go Back”, Samaa TV, 10 October 2026.
[4] “Joint Statement on the Talks Between Afghanistan and Pakistan Through the Mediation of Türkiye and Qatar, 30 October 2025”, Ministry of Foreign Affairs, Republic of Türkiye, 30 October 2025.
[5] Mansoor Ali Khan, “Pakistan STRIKES Afghanistan | Fighter Jets TARGET 7 hideouts | An Indian Fighter Jet also CRASHES”, YouTube, 22 February 2026.
[6] “Pakistan Claims at least 70 Fighters Killed in Strikes Along Afghan Border”, Al Jazeera, 23 February 2026.
[7] “Afghanistan Vows Military Response to Pakistan, Accuses Islamabad of Backing ISIS”, Al Arabiya, 25 February 2026.
[8] “3 Federal Constabulary Personnel Martyred in Terror Attack in K-P’s Karak District: Police”, The Express Tribune, 23 February 2026.
[9] Mansoor Ali Khan, “PAK-Afghan Conflict Escalate | Serious WARNING issued | Two US-Built F-16 Jets Downed”, YouTube, 26 February 2026.
[10] Ibid.
[11] “Pakistan Launched Operation Ghazab lil-Haq ‘in Self-defence’ After 53 Locations Targeted in KP: Ishaq Dar”, Dawn, 2 March 2026.
[12] “Strikes in Afghanistan Carried Out to Ensure Safety of Pakistani Citizens, Prevent Imminent Terrorist Attacks: FO”, Dawn, 26 February 2026.
[13] “‘Open War’: Pakistan and Afghanistan’s Taliban Claim Major Casualties”, BBC, 27 February 2026.
[14] “Afghanistan Launches Attacks Against Pakistan, Draws ‘Immediate Response’”, Al Jazeera, 26 February 2026.
[15] Ibid.
[16] “Pakistan Army Captures Five Afghan Border Posts”, The Nation, 27 Febraury 2026.
[17] Waslat Hasrat-Nazmi, “Iran War Overlaps with Afghanistan-Pakistan Conflict”, DW, 17 March 2026.
[18] “Families Search for Loved Ones After Deadly Pakistan Strike on Kabul Rehab”, Al Jazeera, 17 March 2026.
[19] Elian Peltier, Safiullah Padshah and Zia ur-Rehman, “Pakistan Pauses Afghanistan Airstrikes After Outrage Over Civilian Deaths”, The New York Times, 18 March 2026.
[20] “Pakistan: Airstrike on Afghan Medical Facility Unlawful”, Human Rights Watch, 27 March 2026.
[21] “Statement by the Official Spokesperson on Pakistan’s Cowardly Targeting of Kabul Hospital”, Ministry of External Affairs, Government of India, 17 March 2026.
[22] Ibid.
[23] Elian Peltier, Safiullah Padshah and Zia ur-Rehman, “Pakistan Pauses Afghanistan Airstrikes After Outrage Over Civilian Deaths”, no. 19.
[24] Ibid.
[25] Asif Shahzad, “Pakistan Resumes Military Operations Against Afghanistan”, Reuters, 26 March 2026.
[26] “Afghanistan and Pakistan Hold Peace Talks in Urumqi”, Socialist China, 8 April 2026.
[27] “Afghanistan Brands China Peace Talks with Pakistan ‘Useful’”, Al Jazeera, 7 April 2026.
[28] “Ceasefire at Risk as Pakistan and Afghanistan Report Cross-border Attacks”, Al Jazeera, 27 April 2026.
[29] Ibid.