म्यांमार के राष्ट्रपति की भारत यात्रा: रणनीतिक विकल्पों की तलाश!

सारांश

राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग की भारत यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण रही है, विशेषकर ऐसे समय में जब म्यांमार की नई सरकार की वैधता को अभी भी वैश्विक स्तर पर पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया है। वहीं, म्यांमार में जारी गृह युद्ध का प्रभाव भारत के सीमा प्रबंधन पर भी पड़ रहा है, क्योंकि उसे शरणार्थियों की बढ़ती संख्या के साथ-साथ नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर, चीन और रूस म्यांमार के प्रमुख साझेदार और उसके महत्वपूर्ण रणनीतिक और सामरिक सहयोगियों के रूप में उभरे हैं। इसके बावजूद, इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि भारत म्यांमार के लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार बना रहेग, जिसके संकेत म्यांमार भी दे रहा है। ऐसे में, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव को बनाए रखने के लिए भारत को म्यांमार की नई सरकार के साथ अपने बहुआयामी संबंधों को और अधिक सुदृढ़ करना चाहिए।

भूमिका

अप्रैल 2026 में राष्ट्रपति पद संभालने वाले म्यांमार के राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग ने जून 2026 की शुरुआत में बतौर राष्ट्रपति भारत की अपनी पहली विदेश यात्रा पूरी की। उनकी भारत यात्रा 30 मई को बिहार के गया स्थित महाबोधि मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ शुरू हुई। इसके बाद वह नई दिल्ली पहुंचे, जहां उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ आधिकारिक वार्ता की। इसके पश्चात वह मुंबई गए, जहां उन्होंने व्यापार जगत के प्रमुख प्रतिनिधियों से मुलाकात की। इस दौरान निवेश की संभावनाओं तथा दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को और मजबूत बनाने के उपायों पर चर्चा हुई। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ह्लाइंग के बीच हुई वार्ता में व्यापार, संपर्क (Connectivity), रक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों में सहयोग सहित विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई। इसके अलावा, दोनों नेताओं ने म्यांमार से भारत आने वाले शरणार्थियों, साइबर अपराध, कनेक्टिविटी परियोजनाओं और व्यापक सुरक्षा सहयोग से जुड़े मुद्दों पर भी विचार-विमर्श किया।[1] अपनी यात्रा के दौरान ऊर्जा क्षेत्र के प्रतिनिधियों के साथ बैठकों में राष्ट्रपति ह्लाइंग ने हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen), सौर ऊर्जा (Solar Power) और कार्बन कैप्चर जैसी आधुनिक – पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों की जानकारी प्राप्त की। उन्होंने भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से भी मुलाकात की, जहां दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत बनाने पर सार्थक चर्चा की।[2]

म्यांमार राष्ट्रपति की यह यात्रा कई वजहों से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। 2021 से म्यांमार में जारी गृहयुद्ध का बुरा असर दोनों देशों के बीच लगभग 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा पर भी पड़ा है। भारतीय विदेश मंत्रालय कहता रहा है कि नई दिल्ली म्यांमार में स्थायी शांति और सभी पक्षों को शामिल करने वाली राजनीतिक प्रक्रिया का समर्थन करता है। भारत का मानना है कि बातचीत और संवाद ही इस समस्या के समाधान का सबसे प्रभावी रास्ता है। इस दौरे की सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक था ‘आश्वासन’। दरअसल, फरवरी 2021 के बाद से म्यांमार की सैन्य सरकार (जुंटा) के प्रमुख रहे राष्ट्रपति ह्लाइंग ने भारत को भरोसा दिलाया कि म्यांमार की ज़मीन का इस्तेमाल भारत के सुरक्षा हितों के खिलाफ नहीं होने दिया जाएगा।

भारत के पहले दौरे का संदर्भ

भारत और म्यांमार के बीच द्विपक्षीय संबंधों का विस्तार कई क्षेत्रों तक फैला हुआ है। इनमें ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और रणनीतिक आयाम शामिल हैं। हालांकि, पिछले लगभग तीन दशकों में इन संबंधों में रणनीतिक मामलों और सीमा सुरक्षा प्रबंधन से जुड़े मुद्दे विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गए हैं। वर्ष 2020 के अंत में हुए आम चुनावों के परिणामों को उस समय म्यांमार की सेना ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद फरवरी 2021 में उसने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद मिन आंग ह्लाइंग ने सेना प्रमुख (कमांडर-इन-चीफ) और जुंटा नेता के रूप में देश का शासन संभाला। दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच हुए हालिया चुनावों के बावजूद देश के वास्तविक सत्ता संतुलन में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया, क्योंकि चुनावों में सेना समर्थित राजनीतिक दल यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) ने संसद और क्षेत्रीय प्रतिनिधि सभाओं में 72 प्रतिशत सीटें जीत लीं। इसका नतीजा यह हुआ कि अप्रैल 2026 में नई सरकार के गठन के बाद शासन व्यवस्था का एक नागरिक (सिविलियन) चेहरा उभरता हुआ दिखाई देता है।[3]

यह कहा जा सकता है कि ह्लाइंग के राष्ट्रपति बनने से, उनके नेतृत्व को अब संवैधानिक वैधता के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले की तुलना में अधिक स्वीकार्यता भी मिलने लगी है। इसके बावजूद, यह घटनाक्रम म्यांमार की राजनीति में एक व्यापक प्रवृत्ति को दोबारा सामने लाता है, जिसमें सेना प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राजनीतिक पदों पर काबिज होकर नागरिक शासन की व्यवस्था के भीतर अपनी पकड़ को संस्थागत रूप देती है। म्यांमार पहले भी ऐसी परिस्थितियों से गुज़र चुका है। हालांकि, शासन की वैधता के मुद्दे पर अब हालात पहले से कहीं बेहतर होते लगते हैं, शायद इसलिए ह्लाइंग की शुरुआती विदेश यात्राओं को केवल सामान्य कूटनीतिक दौरों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ये यात्राएं दूसरे देशों से सामान्य कूटनीतिक संबंध बहाल करने और उसे मज़बूत करने के प्रयासों का हिस्सा हैं। यह और भी महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि वर्तमान में देश के भीतर केंद्रीय सरकार की सत्ता और अधिकार को कई विरोधी समूह अब भी चुनौती दे रहे हैं।

फरवरी 2021 के तख्तापलट के बाद से जुंटा सरकार के प्रमुख और जुलाई 2024 से कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर रहे मिन आंग ह्लाइंग के नेतृत्व वाले शासन की वैधता पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। केवल पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों ने ही नहीं, बल्कि एक समूह के रूप में आसियान (Association of Southeast Asian Nations—ASEAN) ने भी उनके शासन को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया, चाहे वह चुनाव से पहले की अवधि रही हो या चुनाव के बाद की।[4] इन परिस्थितियों के बावजूद ह्लाइंग ने चीन और रूस की यात्राएं जारी रखीं। तख्तापलट के बाद वे रूस की चार और चीन की दो यात्राएं कर चुके हैं। दूसरी ओर, चीनी मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी नियमित रूप से नेपीदॉ (Naypyidaw) का दौरा करते रहे हैं।[5] इसके अलावा, उनकी विदेश यात्राएं सीमित ही रही हैं और उन्होंने केवल दो आसियान सदस्य देशों, थाईलैंड और इंडोनेशिया, की यात्रा की है।[6] राष्ट्रपति पद संभालने के बाद चीन के विदेश मंत्री वॉंग यी ऐसे एकमात्र उच्च स्तरीय विदेशी प्रतिनिधि रहे हैं जिन्होंने म्यांमार का दौरा कर नए राष्ट्रपति से मुलाकात की। वहीं भारत की यात्रा के तुरंत बाद राष्ट्रपति ह्लाइंग ने चीनी राष्ट्रपति शी चिनपिंग के निमंत्रण पर 15 से 19 जून 2026 तक चीन की पांच दिवसीय आधिकारिक राजकीय यात्रा की।[7] यह तथ्य ह्लाइंग और उनकी सरकार की विदेश नीति की प्राथमिकताओं और उसके रणनीतिक झुकाव को सामने लाते हैं। ऐसे में भारत की यात्रा विशेष महत्व रखती है, क्योंकि यह दौरा भारत के निमंत्रण पर हुआ था। इसलिए इसे केवल एक सामान्य राजनयिक यात्रा के रूप में नहीं देखा जा सकता। बल्कि यह म्यांमार की विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय वैधता प्राप्त करने की उसकी आकांक्षा और भारत-म्यांमार संबंधों के भविष्य के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और रणनीतिक संकेत के रूप में देखा जा सकता है।

बीजिंग का संरक्षण

पिछले पांच सालों से ज्यादा समय से चल रहे गृह युद्ध के दौर में जुंटा और चीन के बीच न सिर्फ द्विपक्षीय संबंध बने रहे बल्कि कई क्षेत्रों में सहयोग और चीन की उपस्थिति बढ़ी ही है। यहां दो प्रमुख उदाहरण दिए जा सकते है—हथियारों की आपूर्ति और सामरिक सहयोग। चीन लंबे समय से म्यांमार की सेना को हथियार और सैन्य उपकरण उपलब्ध कराता रहा है। हालांकि, म्यांमार की सेना हमेशा इस बात को लेकर सतर्क रही है कि वह चीन पर अत्यधिक निर्भर न हो जाए। इसके बावजूद, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (UN Office of Human Rights) की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1 फरवरी 2021 के सैन्य तख्तापलट से लेकर मई 2023 तक चीन की 41 कंपनियों ने म्यांमार की सैन्य सरकार को लगभग 267 मिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के हथियार और सैन्य सामग्री बेची।[8] इसके अतिरिक्त, चीन ने संचार उपकरण, निगरानी तथा संचार अवरोधन (इंटरसेप्शन) तकनीक, सैन्य ट्रकों के पुर्जे और हथियार निर्माण में प्रयुक्त विभिन्न औद्योगिक मशीनें और उपकरण उपलब्ध कराए हैं। साथ ही उसने नौसैनिक जहाज निर्माण केंद्रों (नेवल शिपयार्ड) को तकनीकी सहायता भी प्रदान की है।[9] अक्टूबर 2024 में एक चौंकाने वाले घटनाक्रम के तहत म्यांमार की सैन्य सरकार ने घोषणा की कि उसने चीनी हितों और परियोजनाओं की सुरक्षा के लिए एक संयुक्त निजी सुरक्षा कंपनी के गठन को मंज़ूरी दे दी।[10] बाद में, फरवरी 2025 में सैन्य सरकार की संसद ने इस संबंध में एक कानून भी पारित कर दिया।[11] इसके बाद क्याउकफ्यू विशेष आर्थिक क्षेत्र (Kyaukphyu SEZ) में निजी सैन्य कंपनियों (PMC) की पहली तैनाती के प्रमाण भी सामने आए।[12] दूसरा उदाहरण सीधे सीधे-सीधे गृह युद्ध से जाकर जुड़ता है। इन गहरे सामरिक संबंधों के अतिरिक्त, म्यांमार के गृहयुद्ध के दौरान चीन ने सशस्त्र जातीय समूहों पर अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए जुंटा और इन समूहों के बीच संघर्षविराम कराने में भी भूमिका निभाई है, जिसका रणनीतिक फायदा म्यांमार की सेना को मिला है।[13]

अप्रैल 2026 में, म्यांमार के नए राष्ट्रपति ह्लाइंग ने पद संभालने के कुछ ही दिनों बाद चीन के विदेश मंत्री वांग यी का स्वागत किया।[14] यह दिखाता है कि म्यांमार के प्रति चीन की सबसे बड़ी चिंता वहां की राजनीतिक स्थिरता है। चीन के लिए लोकतंत्र, संघीय व्यवस्था, राजनीतिक सुधार या मानवाधिकार जैसे मुद्दों से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि देश में व्यवस्था और स्थिरता बनी रहे। मौजूदा स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि म्यांमार में लोकतंत्र का भविष्य क्या होगा, बल्कि यह है कि लगातार जारी अस्थिरता के बीच देश को प्रभावी ढंग से चलाया जा सकता है या नहीं। इससे यह संकेत मिलता है कि चीन म्यांमार में किसी भी ऐसी सरकार या सत्ता का समर्थन करने के लिए तैयार रहेगा जो देश में कानून-व्यवस्था बनाए रख सके और चीन के रणनीतिक तथा आर्थिक हितों की रक्षा कर सके।

म्यांमार चीन की व्यापक रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, क्योंकि यह चीन को उसकी रणनीतिक चुनौती “मलक्का दुविधा” (Malacca Dilemma)[15] से निपटने के लिए एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान करता है। बंगाल की खाड़ी तक पहुंच उपलब्ध कराने वाले क्याउकफ्यू (Kyaukphyu) समुद्री बंदरगाह से चीन के युन्नान प्रांत तक जाने वाली तेल और गैस पाइपलाइनें चीन को ऊर्जा आयात के लिए मलक्का जलडमरूमध्य पर अपनी निर्भरता कम करने में मदद करती हैं।[16] इसके साथ ही, चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारा (China–Myanmar Economic Corridor – CMEC) बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में चीन की आर्थिक उपस्थिति और प्रभाव को और अधिक मजबूत करता है।[17]

म्यांमार, दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक भौगोलिक बिंदु पर मौजूद है। इस स्थिति को भारत के रणनीतिक हितों के संदर्भ में भी समझना जरूरी है, क्योंकि म्यांमार में चीन की बढ़ती मौजूदगी अब भारत के कई महत्वपूर्ण उद्देश्यों से सीधे जुड़ गई है। इनमें भारत की एक्ट ईस्ट नीति, पूर्वोत्तर राज्यों को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने की योजनाएं और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल हैं। दूसरे शब्दों में, म्यांमार में चीन का निवेश केवल आर्थिक गतिविधि नहीं है, बल्कि यह चीन और भारत के बीच लंबे समय से चल रही रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को समझने का एक पैमाना भी है।

चीन उन कुछ देशों में शामिल है जिन्होंने हाल ही में हुई चुनावी प्रक्रिया और मिन आंग ह्लाइंग के राष्ट्रपति बनने का खुलकर समर्थन किया है। इसके बाद कई पर्यवेक्षकों और विश्लेषकों ने तीन महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले हैं। पहला, म्यांमार में मौजूदा राजनीतिक और सैन्य व्यवस्था आने वाले समय में भी देश की राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाती रहेगी।[18] दूसरा, जमीनी हालात को देखते हुए फिलहाल ऐसा कोई विपक्षी समूह दिखाई नहीं देता जो मौजूदा व्यवस्था की जगह ले सके या उसे पूरी तरह चुनौती दे सके।[19] तीसरा, कई देशों के लिए अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था के साथ संवाद और सहयोग बनाए रखना आवश्यक माना जा सकता है।[20]

म्यांमार के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष विभिन्न जातीय सशस्त्र संगठन (Ethnic Armed Organisations—EAOs) हैं। इनमें से कई संगठन चीन-म्यांमार सीमा के आसपास भी सक्रिय हैं। चीन लंबे समय से इन समूहों के साथ संपर्क बनाए हुए है और उनके साथ पारस्परिक हितों पर आधारित संबंध विकसित कर चुका है। इस नीति को कई विशलेषक “नरम और गरम नीति” (“carrot-and-stick”) भी कहते हैं। इसे चीन की रणनीतिक हेजिंग (Strategic Hedging) नीति का हिस्सा भी माना जाता है, [21] जिसके माध्यम से वह किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति में अपने लिए विकल्प खुले रखना चाहता है। दूसरे शब्दों में कहें तो चीन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि चाहे इन क्षेत्रों में म्यांमार की सेना का प्रभाव बना रहे या जातीय सशस्त्र संगठनों का, उसके रणनीतिक और आर्थिक हित प्रभावित न हों। चीन इन संगठनों के पूरी तरह उखाड़ फेंकने के बजाय ऐसी स्थिति को प्राथमिकता देता दिखाई देता है, जिसमें सीमा क्षेत्र अपेक्षाकृत स्थिर और उसके प्रभाव के दायरे में बने रहें। यही कारण है कि चीन की नीति कई बार विरोधाभासी या जटिल लग सकती है। एक ओर वह आधिकारिक रूप से म्यांमार की क्षेत्रीय अखंडता और राष्ट्रीय एकता का समर्थन करता है, वहीं दूसरी ओर वह जातीय सशस्त्र संगठनों पर अपने प्रभाव को भी बनाए रखना चाहता है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि इनमें से कई संगठन आज भी म्यांमार के एक बड़े भूभाग पर वास्तविक नियंत्रण रखते हैं।[22] नतीजतन, म्यांमार की वर्तमान परिस्थितियों में चीन एक विशिष्ट स्थिति में है, जहां वह एक साथ म्यांमार की सरकार, जातीय सशस्त्र संगठनों और विभिन्न स्थानीय शक्ति केंद्रों के साथ संबंध बनाए रखने में सक्षम है।

घरेलू उथल-पुथल को संभालने के साथ-साथ चीन ने म्यांमार को कूटनीतिक सुरक्षा भी प्रदान की है। चीन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर म्यांमार के अलग-थलग पड़ जाने की स्थिति को एक हद तक संभाला है और उसके खिलाफ उठाए गए प्रतिबंधात्मक कदमों के प्रभाव को भी कुछ सीमा तक कम करने में मदद की है।[23] हालांकि, चीन के इस दृष्टिकोण के कुछ दीर्घकालिक नतीजे भी हैं, जिनमें म्यांमार की चीनी निवेश, तकनीक, वित्त और व्यापार पर बढ़ती निर्भरता प्रमुख है। यह निर्भरता म्यांमार के कूटनीतिक विकल्पों को सीमित करती है और उस रणनीतिक संतुलन की उसकी आकांक्षा को भी प्रभावित करती है, जिसे वह भारत, जापान, आसियान और पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को नए सिरे से विकसित करके हासिल करना चाहता है।

रूसः म्यांमार सेना का मजबूत साझेदार

2021 के बाद से म्यांमार अपनी रक्षा जरूरतों के लिए रूस पर ज्यादा से ज्यादा निर्भर होता गया। मॉस्को ने सरकार विरोधी तथा लोकतंत्र और संघवाद समर्थक सशस्त्र समूहों के खिलाफ सैन्य अभियानों में म्यांमार की सेना को बड़े पैमाने पर समर्थन दिया है। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए अनेक अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और पाबंदियों के बावजूद रूस ने म्यांमार के साथ अपने रक्षा संबंध बनाए रखे हैं।[24] चीन के साथ मिलकर रूस ने म्यांमार को अंतरराष्ट्रीय अलगाव और प्रतिबंधों के प्रभाव को कुछ हद तक कम करने में मदद की है। ख़ास बात है कि सैन्य सहायता के अलावा रूस ने म्यांमार को कूटनीतिक, आर्थिक और तकनीकी सहयोग भी प्रदान किया है।

2023 की संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, रूसी रक्षा संस्थाओं ने म्यांमार को लगभग 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के हथियार, सैन्य उपकरण, कच्चा माल और अन्य संबंधित सामग्री उपलब्ध कराई।[25] इन आपूर्तियों में Su-30SME लड़ाकू विमान, Mi-38T हेलीकॉप्टर, वायु रक्षा प्रणालियाँ, रडार प्रणालियाँ, रॉकेट लॉन्चर और साथ ही पहले से मौजूद सैन्य प्लेटफॉर्मों के लिए स्पेयर पार्ट्स शामिल थे।[26] यह सहयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि म्यांमार में चल रहे गृहयुद्ध और सशस्त्र प्रतिरोधी समूहों के खिलाफ सेना के निरंतर अभियानों के बीच सैन्य प्रशिक्षण, तकनीकी रखरखाव और रसद सहायता हथियारों की आपूर्ति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए थे। ऐसे में रूसी सहायता ने तत्मादॉव (म्यांमार सेना) की सैन्य संचालन क्षमता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह सिलसिला अभी भी जारी है, क्योंकि दोनों देशों ने 2026 की शुरुआत में अपने रक्षा सहयोग समझौते को अगले पाँच वर्षों के लिए आगे बढ़ा  दिया है।[27]

रक्षा सहयोग के अलावा, पिछले छह वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापक रणनीतिक समझ भी विकसित हुई है। रूस की सरकारी परमाणु कंपनी (Rosatom) ने म्यांमार के साथ परमाणु ऊर्जा विकास में साझेदारी की है और देश में कम क्षमता वाला परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की योजना बनाई है।[28] साथ ही, रूस म्यांमार का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया है और 2024 में म्यांमार के कुल तेल आयात का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रूस से आया।[29]  आर्थिक क्षेत्र में बढ़ता व्यापार, वित्तीय सहयोग, निवेश को बढ़ावा और ‘दवॉइ स्पेशल इकॉनॉमिक ज़ोन’ (Dawei Special Economic Zone) जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में संभावित सहयोग ने रूस की भूमिका को केवल लेन-देन आधारित साझेदार से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।[30]

रक्षा संबंधों के आगे बढ़ते हुए म्यांमार और रूस ने पश्चिमी वित्तीय प्रणालियों पर निर्भरता कम करने के लिए दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वित्तीय व्यवस्था विकसित करने की कोशिशें इस संबंध का एक और महत्वपूर्ण पहलू हैं। सहयोग का दायरा रक्षा क्षेत्र के अलावा उन्नत प्रौद्योगिकी क्षेत्रों तक भी बढ़ा है, जिसमें रिमोट सेंसिंग परियोजनाएँ और रूसी अंतरिक्ष एजेंसी से जुड़ी अंतरिक्ष संबंधी पहलें शामिल हैं।[31] म्यांमार की निगरानी (रिकॉनिसेंस) उपग्रह क्षमता विकसित करने की महत्वाकांक्षा को लेकर रूस के संभावित समर्थन की खबरें भी सामने आई हैं, हालांकि दोनों सरकारों ने आधिकारिक रूप से ऐसे किसी सहयोग की अभी तक पुष्टि नहीं की है।

परस्पर हितों का बंधन

पिछले पाँच वर्षों के अध्ययन से  यह पता चलता है कि भारत और म्यांमार के बीच रणनीतिक सहयोग का मुख्य दायरा दोनों देशों को संस्थागत रूप से अधिक निकट लाना और विभिन्न क्षेत्रों में क्षमता निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना रहा है।[32] हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने और भारत विरोधी शक्तियों के प्रभाव को संतुलित करने के लिए भारत और म्यांमार द्विपक्षीय स्तर पर सहयोग करने के साथ-साथ आसियान, मेकॉंग-गंगा सहयोग (MGC) और बिम्सटेक (BIMSTEC)[33] जैसे क्षेत्रीय मंचों के माध्यम से भी मिलकर काम करते रहे हैं। इसके अतिरिक्त, अपने उत्तर-पूर्वी राज्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और क्षेत्रीय जनसांख्यिकीय संतुलन को बनाए रखने के उद्देश्य से भारत ने एक व्यावहारिक नीति अपनाते हुए फरवरी 2024 में म्यांमार के साथ फ्री मूवमेंट रिजीम (FMR) को समाप्त भी कर दिया।[34]

संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक रिपोर्ट बताती है कि 2021 के बाद से 2023 तक, म्यांमार की सेना को लगभग 51 मिलियन अमेरिकी डॉलर (51 million dollars) के सैन्य और ऐसे साजो-सामान भेजे गए हैं जिसे मुख्य रूप से दोहरे उपयोग वाले कहा जाता है।[35] रिपोर्टों के अनुसार, इन साजो-सामान की सप्लाई में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, भारत डायनेमिक्स और यंत्र इंडिया जैसी सरकारी कंपनियों के साथ-साथ संदीप मेटलक्राफ्ट और लार्सन एंड टुब्रो (L&T) जैसी निजी डिफेंस कंपनियां भी शामिल रही हैं।[36] इन सभी आपूर्ति करने वालों ने म्यांमार को आर्टिलरी (तोपखाने), मिसाइल स्टॉक और निगरानी (surveillance) के लिए जरूरी उपकरण मुहैया कराए हैं। वहीं, भारत और म्यांमार के बीच द्विपक्षीय व्यापार काफी मजबूत है, जो सालाना 1.95 बिलियन अमेरिकी डॉलर (2025-26) का है।[37] इस तरह भारत म्यांमार का चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार और उसके कृषि क्षेत्र के लिए एक बेहद जरूरी बाजार है। अब भारत और म्यांमार दोनों ने वर्ष 2030 तक इस व्यापार को 5 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है।[38]

2021 का तख्तापलट भारत के लिए अचानक हुआ बड़ा बदलाव था, ठीक वैसे ही जैसे यह ASEAN और दूसरे क्षेत्रीय और पश्चिमी देशों के लिए था। उस समय भारत की सबसे बड़ी चिंता अपनी सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखना थी। इसी वजह से भारत ने म्यांमार की सैन्य सरकार के साथ पहले से मौजूद बातचीत और समन्वय की व्यवस्थाओं को जारी रखा। इन बैठकों में मुख्य रूप से उन उग्रवादी गतिविधियों पर चर्चा की गई जो म्यांमार की जमीन का इस्तेमाल करके भारत के खिलाफ चल रही थीं। साथ ही, सीमा पार से पैदा होने वाले दूसरे खतरों, कनेक्टिविटी परियोजनाओं और महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार पर पड़ने वाले प्रभावों पर भी बात हुई। इस तरह की हालिया बैठक जनवरी 2025 में आयोजित की गई थी।[39]

पिछले कुछ सालों में भारत ने दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया में एक “आपदाओं के समय सबसे पहले मदद पहुंचाने वाले देश” (First Responder) के रूप में भी अपनी भूमिका को मजबूत किया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2025 के भूकंप के दौरान चलाया गया “ऑपरेशन ब्रह्मा” है, जिसके तहत भारत ने बड़े पैमाने पर मानवीय सहायता पहुंचाई।[40] इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने वाली एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में अपनी भूमिका को जारी रखना चाहता है। साथ ही, भारत बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के विकास और स्थानीय क्षमता निर्माण के बीच संतुलन बनाकर दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत बनाए रखने की लगातार कोशिश कर रहा है।

भारत के दृष्टिकोण से म्यांमार सिर्फ उसकी एक्ट ईस्ट नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भर नहीं है, बल्कि सीमा सुरक्षा और प्रबंधन के लिहाज से भी एक बड़ी चिंता का विषय है। इसकी वजह मिजोरम और मणिपुर में आने वाले शरणार्थियों की बढ़ती संख्या, सीमा पार सक्रिय उग्रवादी समूहों के सुरक्षित ठिकाने, नशीले पदार्थों की तस्करी, हथियारों की अवैध तस्करी और गृहयुद्ध से पैदा हुई अस्थिरता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मिन आंग ह्लाइंग के बीच हुई बातचीत में इन मुद्दों पर भी चर्चा हुई थी।[41]

भारत ऐसी स्थिति में म्यांमार सीमा का प्रबंधन कर रहा है, जहां सीमा के दूसरी तरफ  बातचीत और समन्वय के लिए कोई एक केंद्रीय या आधिकारिक सत्ता मौजूद नहीं है, क्योंकि म्यांमार की सेना उन क्षेत्रों को जातीय सशस्त्र संगठनों (EAOs) के हाथों गवां चुका है। दूसरे शब्दों में कहें तो वहां ऐसा कोई मान्यता प्राप्त सरकारी ढांचा नहीं है जिससे सीधे तौर पर संपर्क किया जा सके। भारत जातीय सशस्त्र संगठनों के अधिकार या नियंत्रण को आधिकारिक मान्यता नहीं देता। इसके अलावा, इन संगठनों के भीतर भी काफी बिखराव और आपसी विभाजन है, यहां तक कि भारत की सीमा से लगे क्षेत्रों में सक्रिय समूहों के बीच भी संघर्ष के लक्ष्यों को लेकर एकरूपता नहीं है।[42] भारत के दृष्टिकोण से इन जातीय सशस्त्र संगठनों की भौगोलिक स्थिति बहुत संवेदनशील और महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका सीधा संबंध भारत की सामरिक सोच और कई महत्वपूर्ण अवसंरचना परियोजनाओं से है। इनमें कलादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट परियोजना और भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी प्रमुख परियोजनाएं शामिल हैं।[43] इन परियोजनाओं का एक बड़ा हिस्सा उन इलाकों में स्थित है जहाँ जातीय सशस्त्र संगठन और प्रतिरोधी बलों की मौजूदगी है। इससे इन परियोजनाओं को पूरा करना मुश्किल हो जाता है, इससे भी आगे बढ़कर यदि इन परियोजनाओं के माध्यम से आर्थिक गतिविधियाँ सुचारु रूप से नहीं चल पातीं, तो भविष्य में उनकी उपयोगिता और महत्व पर भी सवाल उठ सकते हैं।[44] हाल के समय में म्यांमार की सेना ने कुछ बड़ी सैन्य सफलताएं हासिल की हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि वह फिर से नए क्षेत्रों में बढ़त हासिल कर रही है। सेना ने प्रतिरोधी समूहों से कई रणनीतिक क्षेत्रों पर दोबारा नियंत्रण स्थापित किया है। सेना की इन हालिया जीतों में विशेष रूप से चिन राज्य (उत्तर-पश्चिमी सीमा क्षेत्र), तनिन्थारयी क्षेत्र (दक्षिणी सीमा क्षेत्र) [45], उत्तरी परिवहन और व्यापार गलियारे (मंडाले से म्यित्क्यिना राजमार्ग) [46] और मगवे क्षेत्र (म्यांमार का केंद्रीय मुख्य इलाका) शामिल हैं।[47]

निष्कर्ष

राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग के राष्ट्रपति बनने से म्यांमार की सरकार को संवैधानिक वैधता हासिल करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता बढ़ाने का अधिक अवसर मिला है। भारत ने म्यांमार के साथ अपने संबंध बनाए रखे हैं, जबकि उसे कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इनमें असुरक्षित सीमा, म्यांमार के गृहयुद्ध का सीमा पार प्रभाव, सैन्य तख्तापलट के बाद शरणार्थियों की बढ़ती संख्या और नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी शामिल हैं। चिंता की बात यह भी है कि म्यांमार से आने वाली इन चुनौतियों की मणिपुर में जारी सामुदायिक तनाव में भी एक गंभीर भूमिका बन गई है। म्यांमार की सैन्य समर्थित सरकार अपनी अधिकांश राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य सहायता के लिए चीन और रूस पर निर्भर है। इसके बावजूद, म्यांमार के लिए भारत का महत्व कम नहीं हुआ है। चाहे म्यांमार दूसरे देशों के साथ कितने भी संबंध विकसित कर ले, भारत उसके लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार बना रहेगा। दूसरी ओर, भारत भी इस स्थिति से लाभ उठा सकता है, क्योंकि उसके पास म्यांमार की नीतियों और दिशा के निर्धारण के बीच अपनी चिंताएं रखने का एक प्रभावी चैनल खुला है। इसलिए भारत के लिए म्यांमार को कम महत्व देना या वहां अपनी उपस्थिति कम करने का कोई विकल्प नहीं है।

इन मौजूदा परिस्थितियों को मद्देनज़र इस बात की आशंका प्रबल लगती है कि देश में चल रहा गृहयुद्ध पूरी तरह समाप्त होने के बजाय कम तीव्रता वाले संघर्ष में बदल जाए, यानी लड़ाई पहले की तरह बड़े स्तर पर नहीं होगी, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों में हिंसा और टकराव जारी रह सकते हैं। साथ ही, सशस्त्र समूहों के प्रति म्यांमार की सेना की पुरानी रणनीतियों को देखते हुए यह भी संभव है कि कुछ समय के लिए यथास्थिति (Status Quo) बनी रहे। इसका मतलब है कि गृहयुद्ध पूरी तरह खत्म नहीं होगा, बल्कि कुछ इलाकों तक सीमित, अलग-अलग स्तरों पर और असमान रूप से जारी रह सकता है। पिछले डेढ़ दशक में म्यांमार में शांति और मेल-मिलाप की कई जटिल और चरणबद्ध प्रक्रियाएँ देखने को मिली हैं। उदाहरण के लिए, 2015 का राष्ट्रव्यापी युद्धविराम समझौता (Nationwide Ceasefire Agreement—NCA) विभिन्न पक्षों को बातचीत की प्रक्रिया में लाने का एक प्रयास था। आने वाले एक से दो वर्षों में सबसे अधिक संभावना इस बात की है कि राष्ट्रीय स्तर पर किसी बड़े समझौते के बजाय क्षेत्रीय या प्रांतीय स्तर पर बातचीत के जरिए व्यवस्थाएं बनाई जाएं। कुछ सशस्त्र समूह मुख्यधारा में पूरी तरह शामिल होने के बजाय अपने-अपने नियंत्रित क्षेत्रों में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का रास्ता चुन सकते हैं और उन क्षेत्रों पर अपनी पकड़ मजबूत कर सकते हैं। ऐसे में भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि वह म्यांमार की सरकार के साथ अपने संबंध बनाए रखे, साथ ही उन क्षेत्रों तक पहुँच और संवाद के रास्ते भी खुले रखे जो सीधे सरकारी नियंत्रण में नहीं हैं। हालांकि, इसके लिए सीमा सुरक्षा और अवैध गतिविधियों से कोई भी समझौता नहीं करने की नीति को और सशक्त करना होगा। इसके अलावा, भारत की संपर्क और परिवहन परियोजनाओं को भी स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए चरणबद्ध और समयबद्ध तरीके से पूरा करना होगा।

This is the updated Hindi translation of the MP-IDSA Issue Brief ‘President Hlaing’s Visit to India and Strategic Diversification Policy of Myanmar’, published on 18 June 2026.

[1] India-Myanmar Ties: PM Modi Raises Border Security, Refugee Concerns in Talks with President Min Aung Hlaing”, The Times of India, 1 June 2026.

[2] President of India Receives President of Myanmar, Press Information Bureau, President’s Secretariat, 1 June 2026.

[3] Myanmar’s New Administration: Military Consolidation, Not Transition”, International Crisis Group, 3 June 2026.

[4] Pro Tem Presidential Duties Transferred to State Administration Council Chairman, The Global New Light of Myanmar, 23 July 2024.

[5] Myanmar Junta Chief Meets China’s Xi for First Time: State Media, The Times of India, 10 May 2025; SAC Chairman Prime Minister Senior General Min Aung Hlaing Holds Talks with President of Russian Federation Mr Vladimir Vladimirovich Putin, The Global New Light of Myanmar, 8 September 2022.

[6] SAC Chairman Prime Minister Senior General Min Aung Hlaing Leaves for Thailand to Attend 6th BIMSTEC Summit, The Global New Light of Myanmar, 4 April 2025; Myanmar Keeps Close Cooperation with ASEAN Member Countries in Accord with the ASEAN Charter: Senior General, The Global New Light of Myanmar, 25 April 2021.

[7] “President Xi Jinping Holds Talks with Myanmar’s President Min Aung Hlaing”, Ministry of Foreign Affairs, People’s Republic of China, 16 June 2026.

[8] The Billion Dollar Death Trade: The International Arms Networks That Enable Human Rights Violations in Myanmar, Conference room paper of the Special Rapporteur on the situation of human rights in Myanmar, A/HRC/53/CRP.2, United Nations Office of the High Commissioner for Human Rights, 17 May 2023.

[9] The 77th Anniversary of Myanmar’s Air Force (MAF) Day: A Review of MAF’s Claimed New Acquisitions, Centre for Information Resilience, Myanmar Witness, 30 December 2024.

[10] Myanmar and China to Establish Joint Security Company: Committee Formed to Finalize MoU, Eleven Myanmar, 4 December 2024.

[11] Maung Kavi, Junta Passes Law Allowing Chinese Security Firms to Operate in Myanmar, The Irrawaddy, 19 February 2025.

[12] Myanmar Military, Chinese Government to Establish Joint Security Company, Myanmar Now, 4 December 2024.

[13] Xu Peng, China’s Selective Influence in Myanmar’s Conflicts, Current History, University of California Press, 1 April 2026.

[14] Myanmar’s President Min Aung Hlaing Meets with Wang Yi, Ministry of Foreign Affairs, People’s Republic of China, 25 April 2026.

[15] “मलक्का दुविधा” (Malacca Dilemma) शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले 2003 में चीन के पूर्व राष्ट्रपति हू जिंताओ ने किया था। See Sanjana Krishnan, The Malacca Dilemma: No Panacea but Multiple Possibilities, ICS Research Blog, Institute of Chinese Studies, 22 May 2020.

[16] Carlos Alatorre, China’s Investments in Myanmar: Analyzing the Status of Projects, Tearline, 8 May 2024.

[17] Bidisha Deka, China’s Naval Playbook in Myanmar: India’s Bay of Bengal Dilemma, Centre for Joint Warfare Studies, Vol. 30, 2023.

[18] Myanmar’s Managed Transition: Military Rule Repackaged as Civilian Governance, India’s World, 23 April 2026.

[19] Mateo Martínez Zubillaga, Myanmar After the Coup: Why Hybrid Regimes Don’t Die, Universidad de Navarra, 18 February 2026.

[20] Umang Bhansali, Myanmar – Russia Partnership: Deepening Strategic Ties, Vivekananda International Foundation, 19 March 2025.

[21] Morgan Michaels, What China’s Growing Involvement Means for Myanmar’s Conflict, IISS Myanmar Conflict Map, 7 August 2023.

[22] Chinese FM: China Supports Early Political Reconciliation in Myanmar, to Deepen Bilateral Cooperation”, The State Council, The People’s Republic of China, 15 August 2024.

[23] Lwin Cho LATT, China’s Involvement in Myanmar’s Peace Negotiations: An Analysis with Special Emphasis on the Non-Interference Principle, Journal of the Asia-Japan Research Institute of Ritsumeikan University, Vol. 4, November 2022.

[24] Umang Bhansali, Myanmar – Russia Partnership: Deepening Strategic Ties, no. 20.

[25] UN Rights Expert Exposes $1 billion ‘Death Trade’ in Arms for Myanmar Military”, United Nations, 17 May 2023.

[26] Myanmar’s Air Force Inducted Three Russian Mi-38T Helicopters and Two Chinese Y-8F-200W Transport Aircraft, Global Defense Corp., 12 November 2025.

[27] Russia and Myanmar Sign Military Cooperation Agreement, The Moscow Times, 3 February 2026.

[28] Rosatom Expands Cooperation with Myanmar in the Field of Nuclear Infrastructure, Communications Department of ROSATOM, 11 October 2023.

[29] Russia and Myanmar Sign Energy Cooperation Agreement: Analysis, Russia’s Pivot to Asia, 22 April 2026.

[30] Umang Bhansali, Myanmar – Russia Partnership: Deepening Strategic Ties, no. 20.

[31] Myanmar and Russia Join Forces for Peaceful Space Exploration, The Global New Light of Myanmar, 27 September 2025.

[32] Bilateral Relations, Embassy of India, Yangon, Myanmar, June 2026.

[33] The Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation (BIMSTEC).

[34] MHA Decides to Scrap Free Movement Regime (FMR) Between India and Myanmar to Ensure the Internal Security of the Country and Maintain the Demographic Structure of India’s North Eastern States Bordering Myanmar, Press Information Bureau, Ministry of Home Affairs, Government of India, 8 February 2024.

[35] The Billion Dollar Death Trade: The International Arms Networks That Enable Human Rights Violations in Myanmar, United Nations Human Rights Special Procedures, May 2023.

[36] Murali Krishnan, How India is Supporting Myanmar’s Military with Arms, Deutsche Welle, 25 May 2023.

[37] Bilateral Relations, Embassy of India, Yangon, Myanmar, June 2026.

[38] India – Myanmar Relations, General and Bilateral Brief: India-Myanmar, Consulate General of India, Sittwe, Myanmar, July 2025.

[39] Ibid.

[40] Ibid.

[41] India-Myanmar Ties: PM Modi Raises Border Security, Refugee Concerns in Talks with President Min Aung Hlaing, no. 1.

[42] A Rebel Border: India’s Evolving Ties with Myanmar After the Coup, International Crisis Group, 11 April 2025.

[43] Implementation of the Kaladan Multi Modal Transit Transport Project in Myanmar at the Revised Cost Estimate of Rs. 2904.04 Crore, PM INDIA, 14 October 2015.

[44] Rajeev Bhattacharyya, Has the Indian Flagship Kaladan Project in Myanmar Hit a Dead End?, The Diplomat, 27 February 2024.

[45] Myanmar Military Recaptures 2 Strategic Border Towns from Ethnic Militias, The Hindu, 21 May 2026.

[46] Myanmar Junta Pushes to Retake Rare-earth Belt Near China Border, Asia News Network, 26 May 2026.

[47] Nyein Chan Aye, Myanmar’s Political Makeover Unmasked by Revolutionary Reality, Asia Times, 1 May 2026.

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