एयरोस्पेस और रक्षा, विशेष रूप से एयरो इंजन से संबंधित प्रौद्योगिकियों का आयात दशकों से एक चिंता का विषय रहा है। कावेरी इंजन कार्यक्रम, एक ऐसे क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत के सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक है जो इसकी एयरोस्पेस क्षमताओं के लिए एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की एक प्रमुख प्रयोगशाला, गैस टर्बाइन अनुसंधान प्रतिष्ठान (GTRE) द्वारा 1986 में शुरू की गई| यह परियोजना तकनीकी उत्कृष्टता के लिए किए गए अथक प्रयास की एक उल्लेखनीय एवं चार दशक लम्बी यात्रा रही है। यह महत्वपूर्ण परियोजना एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता की पहल का एक प्रतीक है। इन 40 वर्षों में, कई उपलब्धियों के साथ, भारत आत्मनिर्भरता के अपने लक्ष्य की ओर एक कदम आगे बढ़ा है। यह मार्च 1989 में भारत सरकार द्वारा ₹ 382.81 करोड़ रुपये[1] के प्रारंभिक बजट आवंटन के साथ शुरू हुआ और जीटीआरई को कावेरी इंजन, 81 kN निम्न थ्रस्ट के कम बाईपास ट्विन स्पूल टर्बोफैन इंजन[2] को डिजाइन और विकसित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, इस उम्मीद के साथ कि यह इंजन लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (LCA) कार्यक्रम में एकीकृत होगा।[3]
मार्च 1995 में ‘कबिनी’ के रूप में प्रख्यात कोर इंजन मॉड्यूल के परीक्षण के साथ, कार्यक्रम ने अपना पहला महत्वपूर्ण मुकाम हासिल किया। इसमें एक उच्च दबाव कंप्रेसर, दहनकर्ता और उच्च दबाव टरबाइन शामिल था, जिसका उपयोग गर्म अंतः भागों की प्रौद्योगिकी और कावेरी इंजन के उच्च दबाव स्पूल के एयरोमैकेनिकल व्यवहार का अध्ययन करने के लिए किया गया था। मूल परियोजना 17 विभिन्न प्रोटोटाइप इंजन बनाने की थी।[4] कावेरी इंजन के पहले पूर्णतः असेंबल किए गए प्रोटोटाइप का ग्राउंड परीक्षण 1996 में जीटीआरई, बेंगलुरु में हुआ और 1998 तक सभी पाँच ग्राउंड-टेस्ट परीक्षण की अवस्था में थे।[5] शुरुआती फ्लाइट टेस्ट 1999 में और एलसीए तेजस पर परीक्षण 2000 में निर्धारित किया गया था।[6] लेकिन, कुछ अभूतपूर्व चुनौतियों के कारण इस कार्यक्रम में रुकावटें आईं, जिन्हें दूर करना आवश्यक था ताकि इसके विकास को निर्धारित समय में वापस पटरी पर लाया जा सके। सबसे बड़ी चुनौती 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध[7] थे, जिससे अमेरिका से महत्वपूर्ण एयरो-इंजन प्रौद्योगिकियों और घटकों के हस्तांतरण में बाधा उत्पन्न हुई।
हालांकि, कावेरी इंजन की तुलना दूसरे देशों से करने पर एक अलग तस्वीर सामने आती है। द वीक मैगज़ीन के अनुसार, वर्ष 1985 और 1995 के बीच यूरोफाइटर के लिए EJ200 इंजन निर्माण पर $ 1.6 अमरीकी बिलियन खर्च किए, डसॉल्ट राफेल के स्नेक्मा M88 इंजन की वर्ष 1989 तक शुरुआती परिक्षण की लागत $1.6 बिलियन तक पहुंच चुकी थी, अमेरिका ने अपने F-35 फाइटर एयरक्राफ्ट के लिए F135 इंजन पर $6.7 अमरीकी बिलियन खर्च किए और चीन ने अपने इंजन विकास परियोजना पर $42 अमरीकी बिलियन का निवेश किया वहीं, कावेरी इंजन कार्यक्रम को लगभग ₹ 382.81 करोड़ मिले[8], जो अन्य इंजनों को मिले वित्तपोषण की तुलना में काफी अपर्याप्त धनराशि थी। इतने निम्न वित्तीय आवंटन के कावेरी इंजन की पूरी तकनीकी विशिष्टताओं और डिज़ाइन विशेषता इस प्रकार से हैं:
तालिका 1[9] – कावेरी इंजन की तकनीकी और डिज़ाइन विशेषताएँ
| नाम
डेवलपर |
GTRE GTX-35VS कावेरी
गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट, बेंगलुरु |
| प्रकार | लो-बाईपास, ट्विन-स्पूल टर्बोफैन आफ्टरबर्नर के साथ |
| अधिकतम थ्रस्ट (शुष्क) | 52 kN |
| अधिकतम थ्रस्ट
(आफ्टरबर्नर के साथ) |
81 kN |
| बायपास रेश्यो | 0.2-0.24 |
| ओवरऑल प्रेशर रेश्यो | 21.5 |
| वायु मास फ्लो | 78 kg/s |
| कम्बस्टर टाइप | फुल एन्युलर कम्बस्टर |
| थ्रस्ट/वेट रेश्यो
वजन लक्ष्य |
7.8
1,100 kg |
| टर्बाइन स्टेज | 1 हाई-प्रेशर + 1 लो-प्रेशर टर्बाइन |
| कंप्रेसर स्टेज | 3-स्टेज लो-प्रेशर + 6-स्टेज हाई-प्रेशर कंप्रेसर |
इस योजना को दिसंबर 1996 की मूल समापन तिथि तक भी पूरा नहीं किया जा सका। इसलिए जीटीआरई ने विदेशी इंजन द्वारा समकक्ष समीक्षा की गई। प्रौद्योगिकी सामग्री की देरी से डिलीवरी, विशिष्ट मिश्र धातुओं के निर्माण में कठिनाइयाँ, एक्सप्लोरेटरी एल्टीट्यूड टेस्ट और फ्लाइट टेस्ट बेस्ड ट्रायल जैसे कुछ परीक्षणों की शुरूआत अनिश्चितताओं का कारण बनी। हालांकि, डिजाइन और सामग्री में बदलाव की आवश्यकता के कारण जीटीआरई इस विस्तारित लक्ष्य तिथि को पूरा करने में असमर्थ रहा, जिसमें उप-प्रदर्शन कंप्रेसर जैसी कुछ खामियां सामने आईं। एक संशोधित संभावित समापन तिथि, यानी दिसंबर 2004 को मंजूरी दी गई, जिसे भी दिसंबर 2009 तक के लिए स्थगित कर दिया गया।[10]
इस परियोजना का प्रारंभिक डिज़ाइन जीटीआरई के पास पर्याप्त कम्प्यूटेशनल द्रव गतिकी (सीएफडी) संसाधनों और पूर्व पवन-सुरंग डेटा के एक मजबूत संग्रह तक पहुँच से पहले का है।
कावेरी कार्यक्रम को वित्तीय आवंटन करने का प्राथमिक उद्देश्य एक ऐसा इंजन बनाना था जो तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट को गति दे सके। लेकिन कई कारणों से इंजन, विमान की महात्वाकांक्षा को पूरा करने में सक्षम नहीं था।[14] LCA को उड़ाने के लिए आवश्यक कावेरी इंजन का वजन 1100 किलोग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए। पहले असेंबल किए गए कावेरी K1 इंजन का वजन लगभग 1423.78 किलोग्राम था। इसलिए, GTRE ने वजन को आवश्यक स्तर तक कम करने पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया। कंप्रेसर, टर्बाइन और इंजन नियंत्रण प्रणाली के विकास में देरी हुई, जबकि इसकी लागत में लगभग 186.61 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई।[15] कंप्रेसरों के प्रदर्शन में यांत्रिक खराबी थी। इसके अलावा, जीटीआरई टर्बाइन ब्लेड के डिज़ाइन को अंतिम रूप देने में भी असमर्थ रहा।
वर्ष 2004 के मध्य में इंजन रूस में हाई- एल्टीट्यूड वाले परीक्षणों में विफल[16] रहा, जिससे तेजस लड़ाकू विमानों के पहले उत्पादन बैच के साथ इसके उपयोग की उम्मीदें समाप्त हो गईं। विफलताएं 2000 के दशक तक जारी रहीं, इंजन 1700 घंटों के परीक्षणों से गुजर चुका था और फरवरी 2008 तक इसे दो बार हाई- एल्टीट्यूड वाले परीक्षणों के लिए रूस भेजा जा चुका था।[17] ऐसी विसंगतियों और देरी के परिणामस्वरूप कावेरी इंजन को 2008 में आधिकारिक तौर पर तेजस एलसीए से अलग कर दिया गया, जिसने बाद में अमेरिकी जीई F404 इंजन को अपना लिया। इन सभी के बीच, आशा की एक किरण तब जगी जब 4 नवंबर, 2010 को मॉस्को के ग्रोमोव फ्लाइट रिसर्च इंस्टीट्यूट में कावेरी प्रोटोटाइप (K-9) का सफलतापूर्वक उड़ान परीक्षण किया गया।[18] हालांकि परीक्षण के परिणाम आशाजनक थे, लेकिन 2011 की CAG रिपोर्ट एक स्पष्ट चेतना बनके सामने आयी। इसने कार्यक्रम की लागत में वृद्धि को उजागर किया, जिसमें छह में से केवल दो लक्ष्य पूरे किए गए थे। तकनीकी जटिलताओं, महत्वपूर्ण उपकरणों की कमी, तकनीकी-उन्नत देशों द्वारा तकनीकों से इनकार, देश में परीक्षण सुविधाओं की कमी और कुशल जनशक्ति की अनुपलब्धता को कावेरी परियोजना में बार-बार होने वाली देरी के प्रमुख कारणों के रूप में चिन्हित किया गया था।[19]
राज्यसभा में 2021 में दिए गए बयान[20] के अनुसार, कावेरी इंजन, प्रमुख क्षेत्रों में उन्नत प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर तक पहुँचने के बावजूद, एचएएल तेजस के एफओसी (अंतिम परिचालन मंजूरी) संस्करण को शक्ति प्रदान नहीं करेगा। यह निर्णय एफओसी संस्करण की अधिक थ्रस्ट की आवश्यकता से उपजा है, जो कावेरी का वर्तमान डिज़ाइन प्रदान नहीं कर सकता है। कावेरी परियोजना से प्राप्त ज्ञान संभावित रूप से एचएएल एएमसीए (AMCA) के लिए भविष्य के इंजन विकास में लाभकारी हो सकता है – एक ऐसा कार्यक्रम जहाँ अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां एक नया पावरप्लांट बनाने के लिए साझेदारी कर सकती हैं । अक्टूबर 2022 में, कावेरी इंजन का अतिरिक्त हाई- एल्टीट्यूड परीक्षण रूस के ग्रोमोव फ्लाइट रिसर्च इंस्टीट्यूट में किया गया था ये आंकड़े परियोजना की मूल आवश्यकता 81 kN और LCA तेजस को शक्ति प्रदान करने के लिए आवश्यक 85+ kN से कम हैं।[21] फरवरी 2023 में, कावेरी इंजन ने रूस में बारानोव सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ एविएशन मोटर डेवलपमेंट में 75 घंटे की हाई-एल्टीट्यूड की जांच की। इस अवधि के दौरान, इंजन को 13,000 मीटर (42,651 फीट) के बराबर सिम्युलेटेड स्थितियों के अधीन किया गया था, जिससे 48.5 kN[22] का शुष्क थ्रस्ट हासिल हुआ। स्वदेशी इंजन के विकास सहित आत्मनिर्भरता, शुरू से ही एलसीए कार्यक्रम का एक प्रमुख उद्देश्य था। हालांकि, कावेरी इंजन को विकसित करने में कठिनाइयों के कारण, जनरल इलेक्ट्रिक F404-GE-F2J3 आफ्टरबर्निंग टर्बोफैन को अस्थायी प्रतिस्थापन के रूप में चुना गया, तेजस मार्क 1A को भी इसी इंजन से शक्ति मिलेगी। तेजस मार्क 2, जो कि एक आगामी संस्करण है, में जनरल इलेक्ट्रिक F414-INS6 इंजन का इस्तेमाल होगा।[23] परिणामस्वरूप, तेजस LCA कार्यक्रम अब कावेरी इंजन पर निर्भर नहीं रहेगा।
प्रोजेक्ट घातक, एक गुप्त यूसीएवी (UCAV) परियोजना का उद्देश्य एक फ्लाइंग-विंग डिज़ाइन तैयार करना है, जो पारंपरिक यूसीएवी की तुलना में अंतर्निहित गुप्त क्षमताएँ, अधिक पेलोड क्षमता प्रदान करता है। हालाँकि, यह अपनी अधिक जटिल उड़ान नियंत्रण सतहों और प्रणालियों के कारण चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है। घातक यूसीएवी के एक पारंपरिक लड़ाकू जेट से हल्का होने की उम्मीद है और इसमें GTRE GTX-35VS कावेरी टर्बोफैन का एक “ड्राई इंजन” संस्करण शामिल होने का अनुमान है, जो 52 kN का थ्रस्ट उत्पन्न करने में सक्षम है। 2016 में, घातक के डिज़ाइन और महत्वपूर्ण तकनीकों के विकास के लिए ₹231 करोड़ रुपये का प्रारंभिक वित्त आवंटित किया गया था।[24] भारतीय नौसेना ने भी इस पहल में रुचि दिखाई है, जिसका लक्ष्य अपने आगामी लैंडिंग प्लेटफ़ॉर्म डॉक्स (LPD) और विमानवाहक पोतों के लिए डेक-आधारित यूसीएवी प्राप्त करना है।
वर्तमान में तकनीक ही किसी देश को शक्ति प्रदान करती है। तकनीक के क्षेत्र में दुनिया पर अमेरिका का प्रभुत्व व्यवस्थित वित्तीय आवंटन और समयबद्ध परियोजना-उन्मुख अनुसंधान का परिणाम है। हर साल विशिष्ट परियोजनाओं की सूची के लिए समय-सीमा के साथ वित्तीय घोषणा की जाती है और तदनुसार समय-समय पर धन का आवंटन आरक्षित किया जाता है। अनुसंधान परियोजनाओं में व्यापक विभागीय आवंटन शामिल नहीं होते हैं और ये वार्षिक व्यय प्रतिबंधों या प्रत्येक वित्तीय वर्ष के अंत में आंशिक निधि समर्पण के अधीन नहीं होती हैं। भारत अनुसंधान क्षेत्र में अपने सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 0.6% – 0.7% खर्च करता है,[25] जबकि अमेरिका अपने सकल घरेलू उत्पाद का 2.8% और चीन अपने सकल घरेलू उत्पाद का 2.1% खर्च करता है।[26] यदि हम सैन्य निर्माण में आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं तो हमें अनुसंधान एवं विकास के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करनी होंगी।[27] इस तरह के अनुसंधान एवं विकास का न केवल सैन्य बल्कि जबरदस्त नागरिक अनुप्रयोग भी हो सकता है, जैसे कि अमेरिका का जनरल इलेक्ट्रिक्स अधिकांश नागरिक विमान को शक्ति प्रदान करता है।
वित्त के अलावा, विशेष रूप से जेट इंजन के क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। भारत में अनुसंधान के लिए मानव संसाधन और प्रतिभा की कमी नहीं है, जैसा कि पश्चिम की अधिकांश प्रमुख अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं में भारतीयों की भागीदारी से स्पष्ट है। स्वदेशी फर्मों को घरेलू स्तर पर सुनिश्चित व्यवसाय के साथ शामिल किया जाना चाहिए और संभावित उत्पादों का निर्यात करना चाहिए ताकि वे इस क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ को नियुक्त कर सकें। कावेरी परियोजना मुख्यतः उच्च ईंधन खपत, थ्रस्ट-टू-वेट अनुपात और इंजन विश्वसनीयता जैसे क्षेत्रों में तकनीकी कमियों के कारण अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पाई है। बेहतर धातु-विज्ञान और परीक्षण सुविधाओं से इन कमियों को दूर किया जा सकता है। निजी उद्योग के साथ एक अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण समय की अपरिहार्य आवश्यकता है। प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए विदेशी कंपनियों के साथ सहयोग को और बढ़ावा देने की आवश्यकता है। रणनीतिक लाभ के साथ ऐसे प्रयासों को नया रूप देने की आवश्यकता है ।
इस कार्यक्रम में ‘K9’ और ‘K10’ इंजन शामिल हैं, जिन्हें मूल कावेरी इंजन की बाधाओं को दूर करने के लिए डिज़ाइन किया जा रहा है। ‘K9’ इंजन एक निश्चित उड़ान क्षेत्र में नई तकनीकों के सत्यापन के लिए एक प्रोटोटाइप और परीक्षण स्थल के रूप में कार्य करता है, जबकि K10 इंजन एक उत्पादन-मानक मॉडल है जिसे बाहरी सहयोग से विकसित किया गया है और जिसे भविष्य के विमानों के लिए 90-100 kN का थ्रस्ट प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।[28] कावेरी 2.0 में ऐसी तकनीकें शामिल हैं जो थ्रस्ट क्षमताओं में सुधार करेंगी। यह 55-58 kN का शुष्क थ्रस्ट और 90-100 kN का संयुक्त आफ्टरबर्नर थ्रस्ट प्राप्त करने का अनुमान है, जो GE F414 जैसे इंजनों के अनुरूप है। कुछ पुर्जों के लिए टाइटेनियम मिश्र धातुओं और टरबाइन ब्लेड जैसे उच्च तापमान वाले भागों के लिए निकल-आधारित सुपरअलॉय सहित उन्नत सामग्रियों का उपयोग करके प्रदर्शन को और बेहतर बनाया गया है।
कावेरी इंजन कार्यक्रम, जो भारत की एयरोस्पेस आत्मनिर्भरता की आधारशिला है, को तकनीकी, वित्तीय और बाहरी स्रोतों पर अत्यधिक निर्भरता की चुनौतियों पर काबू पाने को प्राथमिकता देनी होगी ताकि वह अपनी योजना को पूरा कर सके। महत्वपूर्ण तकनीकों तक पहुँचने के लिए वैश्विक साझेदारों के साथ सहयोग को गहरा किया जाना चाहिए, साथ ही देश के भीतर अनुसंधान और विकास के लिए संसाधनों में वृद्धि की जानी चाहिए, जो कि थ्रस्ट और प्रदर्शन को बढ़ाने के लिए आवश्यक है। स्वदेशी परीक्षण सुविधाओं में निवेश बढ़ाने से विकास और आत्मनिर्भरता सुनिश्चित होगी। कावेरी मरीन गैस टर्बाइन और घातक के लिए ड्राई कावेरी की सफलता इस परियोजना की महत्ता को उजागर करती है, जिसका उपयोग अनुप्रयोगों में विविधता लाने के लिए किया जाना चाहिए। गोदरेज एयरोस्पेस के मामले में निजी उद्योग को शामिल करने से भागीदारी, नवाचार और उत्पादन में तेजी आ सकती है।[29] कावेरी 2.0 के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए चरणबद्ध लक्ष्यों और पर्याप्त वित्त आवंटन के साथ एक स्पष्ट रोडमैप महत्वपूर्ण है, जो एएमसीए जैसे भविष्य के विमानों में एकीकरण को सक्षम करेगा, जिससे भारत की तकनीकी संप्रभुता को मजबूती मिलेगी।
कावेरी इंजन कार्यक्रम, एक ऐसे क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत के सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक है जो इसकी एयरोस्पेस क्षमताओं के लिए एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। इस कार्यक्रम की सफलता या विफलता भारत की रक्षा क्षमता, क्षेत्रीय प्रभाव और वैश्विक एयरोस्पेस क्षेत्र में एक उल्लेखनीय स्थिति के लिए अपरिहार्य निहितार्थ रखती है। विदेशी तकनीक पर निर्भरता में कमी लाते हुए, साथ ही रणनीतिक साझेदारियों और संयुक्त उद्यमों को बनाए रखते हुए, कावेरी इंजन कार्यक्रम आज की अस्थिर दुनिया में स्थिरता का प्रतीक साबित हो सकता है। एयरोस्पेस और रक्षा, विशेष रूप से एयरो इंजन से संबंधित प्रौद्योगिकियों का आयात दशकों से एक चिंता का विषय रहा है। आयात के मात्रात्मक पहलू को देखते हुए, भू-राजनीतिक क्षेत्र में वर्तमान और अप्रत्याशित उथल-पुथल के कारण आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान का जोखिम है। पोखरण के बाद के प्रतिबंध ऐसे ही एक व्यवधान थे, जिसके कारण कार्यक्रम के लिए आवश्यक कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों को नकार दिया गया। इस संबंध में एक सफल स्वदेशीकरण सबसे आवश्यक बदलाव लाएगा जो भारत को बाहरी दबावों, जैसे प्रतिबंधों या निर्यात नियंत्रणों से बचाएगा, जिससे प्रतिकूल पड़ोसियों से भरे इस क्षेत्र में उसकी रणनीतिक स्वतंत्रता और स्वायत्तता बढ़ेगी।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की स्थिति एक ऐसा पहलू है जिसे कावेरी द्वारा मज़बूत किया जा सकता है। यह क्षेत्र लगातार बढ़ते तनावों से चिह्नित है, खासकर चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच, जिसे वैश्विक अस्थिरता लाने की क्षमता रखने वाली वैश्विक शक्तियां मानते हैं। चीनी WS-10 और WS-15 इंजनों का प्रभावी मुकाबला करने के लिए भारत का इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना बेहद ज़रूरी है। साथ ही यह दक्षिण-पूर्व एशियाई, अफ्रीकी और मध्य-पूर्वी देश में भी अपने बाज़ार खोल रहा है, जो पश्चिमी या चीनी प्रणालियों के किफ़ायती विकल्प तलाश रहे हैं, स्वदेशी इंजनों का निर्यात करके, भारत रणनीतिक साझेदारियों को बढ़ावा दे सकता है। यह भारत की व्यापक विदेश नीति के लक्ष्यों के अनुरूप है, जिसमें एक शांतिपूर्ण और स्थिर अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को बढ़ावा देना और क्वाड जैसे समकक्ष मंचों के माध्यम से समान विचारधारा वाले देशों के साथ संबंधों को मज़बूत करना शामिल है।
[1] “Report on the Audit of the Ministry of Defence, Air Force, Navy, Coast Guard, and Associated Units for the Year Ended March 2009” , Report No. 16 of 2010-11 (Air Force and Navy), Comptroller and Auditor General of India, Government of India, p. 77.
[2] “Kaveri | Defence Research and Development Organisation”, Ministry of Defence, Government of India.
[3] Ibid.
[4] Amartya Sinha, “Indigenous Combat Jets and Kaveri Turbofan Engine: All Abou IAF’s New Aerospace Plan”, India Today, 16 May 2023.
[5] Ibid.
[6] Sumit Ahlawat, “India’s Indigenous Fighter Jet Engine Dream One Step Closer to Reality as Kaveri Approved For Inflight Testing”, The EurAsian Times, 26 December 2024.
[7] “Statement by the Press Secretary India Sanctions”, Office of the Press Secretary, The White House, United States of America, 13 May 1998.
[8] Sanjib Kr Baruah, “The Kaveri Programme Has Moved on to Stealth from Jet”, The Week, 14 September 2025; “Report on the Audit of the Ministry of Defence, Air Force, Navy, Coast Guard, and Associated Units for the Year Ended March 2009”, no. 1.
[9] Defence Research and Development Organisation, “Gas Turbine Research“, Technology Focus, Vol. 17, 5 October 2009.
[10] “Report on the Audit of the Ministry of Defence, Air Force, Navy, Coast Guard, and Associated Units for the Year Ended March 2009”, no. 1.
[11] Ibid.
[12] Ibid., p. 79.
[13] Ibid, p. 83.
[14] Ibid.
[15] Ibid.
[16] Sumit Ahlawat, “India’s Indigenous Fighter Jet Engine Dream One Step Closer To Reality As Kaveri Approved For Inflight Testing”, no. 6.
[17] Amartya Sinha, “Indigenous Combat Jets and Kaveri Turbofan Engine: All About IAF’s New Aerospace Plan”, no. 4.
[18] Ibid.
[19] “DRDO Projects”, Press Information Bureau, Ministry of Defence, Government of India, 17 December 2017.
[20] “Development of Kaveri Engine”, Press Information Bureau, Ministry of Defence, Government of India, 21 November 2021.
[21] P. Narayanan and J. Deepak, “Aero India 2023: GTRE Completes High-altitude Testing of Kaveri Derivative Engine”, Janes, 17 February 2023.
[22] Sumit Ahlawat, “India’s Indigenous Fighter Jet Engine Dream One Step Closer To Reality As Kaveri Approved For Inflight Testing”, no. 6.
[23] “GE F414 Engines Selected to Power India Light Combat Aircraft Program”, GE Aerospace News, 1 October 2010.
[24] “DRDO Projects”, Press Information Bureau, Ministry of Defence. Government of India, 3 February 2017.
[25] “Parliament Question: R&D Investment in India”, Press Information Bureau, Ministry of Science & Technology, Government of India, 7 August 2025.
[26] “R&D Expenditure Ecosystem: Current Status & Way Forward”, Economic Advisory Council to the Prime Minister, Government of India, Chapter No. 05, July 2019, p. 29.
[27] Samir V. Kamat, “Special Address: 21st Subroto Mukerjee Seminar”, YouTube, 3:30–5:20, 7 January 2025.
[28] Joseph P. Chacko, “Kaveri 2.0 Program: Overcoming Constraints to Power India’s Future Aircraft”, Raksha Anirveda, 8 April 2025.
[29] “Godrej Aerospace Wins an Order for Manufacturing Eight Modules of the DRDO Turbojet Engine”, Godrej Aerospace, 20 February 2023.